मजहबी जिहादी


अंतर्मन की ज्वाला को और मत बढ़ाइए,
इक्कीस नहीं एक मरे बातें मत झुठलाइए।
मत भूलिए कि जाति धर्म सब बाद में आता है,
इंसान मरे हैं!
इंसानियत के नाते भी अपनी संवेदना दिखाइए।
क्या मजहब मानव से ऊपर की चीज है?
मैं थोड़ी नासमझ हूं, गर है तो कैसे मुझे बताईए?
सबसे पहले तो यहां इंसानियत की बात है,
हम भारतीय है!
भारतवासी बर्बरता का भेंट चढ़ा है,
महाराज! कुछ तो तरस खाइए।
ये दरिंदे बचने ना पाएं इसकी दुआ मनाइए,
पुश्तें भी उनकी याद रखें हाकिम ऐसी तरकीब लगाइए।
मत करो कोई टीका टिप्पणी ना कोई सवाल उठाइए,
आग लगी है सीने में इसे और मत भड़काइए।
कोई कह रहा हिन्दू मरा कल को मर सकता मुसलमान,
क्या बारी-बारी खुशियां मनाएं इतना नीच है हमारा इमान?
थू है ऐसी सोच पर, कितना गिर गया इंसान?
गर थोड़ी सी भी इंसानियत बची हो तो शर्म करो हैवान।
मन इतना घबरा रहा, जी करता दहाड़ लगाऊं,
हैवानों की बोटी-बोटी कुत्तों में जाके बांट के आऊं।
तुम इतने कठोर हो कैसे, कैसे तुम्हें इंसान बतलाऊं ?
मैं तो तब से सो न पाई, जब से मासूमों ने जान गंवाई!
ऐसी क्रूरता सूरमा नहीं राक्षस हीं कर जाते हैं,
जो निहत्थे; बेगुनाहों को मारते हैं और मर्दानगी दिखलाते हैं।
ये तो राक्षस हैं; भेड़िए हैं उन्हें इंसानियत से क्या लेना,
पर मैं पूछती हूं गर तुम इंसा हो तो क्या मतलब इनके संग होना?
लगता है कुछ उनकी जातियां मानवों में मिल गए हैं,
तभी रहकर-रहकर राक्षसों की भाषा बोलने लग जाते हैं।
बांट देते हैं जाति; मजहब में उनके संग हीं हो लेते हैं,
शर्म, स्नेह, इंसानियत भूलकर करते हैं तारीफ़दारी,
ये है उनका मजहब; लगता बची नहीं खुद्दारी।
सच तो ये है; ये ऐसी बर्बरता की ताक में रहते हैं,
इसीलिए ऐसे मौके पर उनके साथ खड़े दिखते हैं।
इन्हें भी आतंकी घोषित कर सरकार उचित कार्रवाई करे ,
या इनके प्रिय भाई-बंधुओं से मिलवाने का समुचित प्रबंध करे।
अरे ये उनसे भी खतरनाक हैं, ये जिहादियों के बाप हैं,
जिसे इस माहौल में भी मजहब दिखाई देता है।
वो देशद्रोही हैं,भारतीय नहीं कलंक हैं,
ये इंसा नहीं हैवान हैं, मानवता के लिए अभिशाप हैं…!!
मानसी सिंह (अनुसंधायिका)
स्नातकोत्तर हिंदी विभाग
मगध विश्वविद्यालय, बोधगया।