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——रमेश ‘कँवल’,बिहार प्रशासनिक सेवा के सेवा निवृत पदाधिकारी द्वारा रविवरीय अंक के लिए संकलित—–

पवन शर्मा, भादरा, राजस्थान की ग़ज़ल
ख़ुद उस का घर-बार नहीं था
माना वो गुलज़ार नहीं था।
फिर भी कुछ बेकार नहीं था।
उम्र भले ही लम्बी गुज़री
बूढ़ा था बीमार नहीं था।
था तैनात सड़क पर हर दम,
माना पहरेदार नहीं था।
नीम हकीम नहीं था लेकिन
कम उस का किरदार नहीं था।
एक शजर था चौराहे का
कोठी- बॅंगला, कार नहीं था।
वो बस्ती का, बस्ती उस की
ख़ुद उस का घर-बार नहीं था।
मौत मिली उस को भी ऐसी
जिस का वो हकदार नहीं था।
पढ़ता कौन व्यथा पर उस की
वो ताज़ा अख़बार नहीं था।
🙏🌳🦚
© पवन शर्मा

