तेजस्वी के वादे पर नीतीश की मुहर सियासत में श्रेय की होड़…


लेखक: सैय्यद आसिफ इमाम काकवी
बिहार की सियासत इन दिनों करवट ले रही है। एक ओर राहत की सांस लेती जनता है, दूसरी ओर कन्फ्यूज दिखते वोटर और तीसरी ओर चालाकी से श्रेय बटोरती सरकार। जब तेजस्वी यादव ने 200 यूनिट मुफ़्त बिजली देने का ऐलान किया था, तब कई लोगों को यह चुनावी जुमला लगा। पर अब वही वादा, थोड़ा कटा-छँटा और 125 यूनिट में बदलकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा लागू कर दिया गया। सवाल उठता है—यह जनता के हित में लिया गया फ़ैसला है या राजनीतिक स्टंट?
बिहार में बिजली की समस्या कोई नई बात नहीं। महंगी दरें, अघोषित कटौती और खराब सप्लाई से त्रस्त जनता के घरों में भले ही बल्ब जलते थे, पर जेब जल जाती थी। नीतीश जी ने ऐन चुनाव से पहले जनता को तोहफा देकर यह जताया कि वे वादों से नहीं, काम से वोट मांगते हैं। मगर ये वादा किसका था? तेजस्वी यादव का अब नीतीश कुमार उसे लागू कर रहे हैं, तो क्या ये उनकी खुद की नीति है, या विरोधी के घोषणापत्र की नक़ल? कभी तेजस्वी से हाथ मिलाते हैं, कभी मोदी की तारीफ़ों के पुल बांधते हैं। जनता असमंजस में है—नीतीश जी की मंज़िल क्या है?
“संघ मुक्त भारत” का नारा देने वाले आज डबल इंजन की सवारी कर रहे हैं। सियासत की ये दोहरी चाल बिहार की जनता को अब समझ आने लगी है। मानते हैं कि 125 यूनिट मुफ़्त बिजली का फ़ैसला गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए एक बड़ी राहत है। जो लोग पंखा चलाने से डरते थे, अब शायद राहत की सांस लें।
मगर जनता के ज़हन में ये सवाल ज़रूर है अगर यही वादा तेजस्वी पूरा करते तो क्या तब भी नीतीश सरकार इसे इतनी तत्परता से लागू करती? बात सिर्फ योजनाओं की नहीं, नेतृत्व की भी है। हाल ही में मेरी मुलाक़ात जनता दल यूनाइटेड के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के प्रदेश उपाध्यक्ष व विधानसभा प्रभारी सादिक़ अख़्तर साहब से हुई।
यह कोई औपचारिक भेंट नहीं थी, यह बिहार के भविष्य से मुलाक़ात थी। सादिक़ अख़्तर उस मिट्टी के नेता हैं, जो चमक-दमक से दूर, पर जनता के दिल में बसे हैं। बिना दाग़, बिना दिखावा सच्चे जनसेवक। जेडीयू को चाहिए कि ऐसे सिपाहियों को पहचान कर आगे लाए, तभी सुशासन की नींव मजबूत होगी। बिहार को सिर्फ़ योजनाओं की नहीं, संवेदनशील और ईमानदार नेतृत्व की ज़रूरत है। नीतीश कुमार का विकास मॉडल तभी टिकाऊ होगा जब उसमें सादिक़ अख़्तर जैसे नेताओं की मज़बूत ईंटें होंगी। बिहार आज एक मोड़ पर खड़ा है। जहाँ एक ओर राजनीति में चालें हैं, वहीं दूसरी ओर जनता के बीच सच्चे नेताओं की तलाश भी। तेजस्वी के वादे और नीतीश का क्रियान्वयन एक राजनीतिक कॉपीपेस्ट बन चुका है। पर सवाल यही रहेगा विकास की कहानी किसकी होगी और इतिहास में नाम किसका लिखा जाएगा? जय बिहार। जय सुशासन।