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ये सच है वह बेघर बंजारा है पर अपनो का ही मारा है

ये सच है वह बेघर बंजारा है
पर अपनो का ही मारा है
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ये सच है वह बेघर बंजारा हैं
पर अपनो का ही मारा है
देखो जीतने चला था दुनिया को
अपने ही घर में हारा है
लोग क्या थे और क्या हो गए
यहां गर्दिश में सितारा है
कैसे मिटेगी तिशनगी ये प्यास
दारिया का पानी खारा है
अब शराफत का कोई मोल नहीं
(परिंदा)पैसा ही सबको प्यारा है
ये सच है वह बेघर बंजारा है
पर अपनो का ही मारा है
रचना परिंदा जहानाबादी उर्फ बलिराम प्रसाद स्वर्णकार