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तेरी यादों के जंगल में, दिल भटक रहा है आज तलक

तेरी यादों के जंगल में, दिल
भटक रहा है आज तलक
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ख़्वाबों में ही सही आके
दिखला जा एक झलक
तेरी यादों के जंगल में, दिल
भटक रहा है आज तलक
नाम तेरा आए लब पे
आंखें जाती है छलक
तेरी यादों के जंगल में, दिल
भटक रहा है आज तलक
गुजरे हैं दिन गलियों में
मयकदे में रातें
तन्हाई से दिल घबराए
ख़ुद से करूं मैं बातें
बेबस है क्यों इश्क मोहब्बत
कैसी है ये चाहत
तेरी यादों के जंगल में,दिल
भटक रहा है आज तलक
नक़्श भी मिलता नहीं
ढूंढे हम तुझको कहां
चैन से जीने ना दे , करूं
हाले दिल कैसे बयां
मेरी हर सांसों को बस
है तेरी ही ज़रूरत
तेरी यादों के जंगल में ,दिल
भटक रहा है आज तलक
तेरी यादों के जंगल में, दिल
भटक रहा है आज तलक
गीतकार — परिंदा जहानाबादी उर्फ बलिराम प्रसाद स्वर्णकार

