“मिर्ज़ा ग़ालिब कॉलेज, गया में बदलाव की नई इबारत लिख रहे हैं शब्बी शम्सी”



“मिर्ज़ा ग़ालिब कॉलेज, गया में बदलाव की नई इबारत लिख रहे हैं शब्बी शम्सी”
✍️ लेखक: सैयद आसिफ इमाम काकवी ख़ास दुबई से
जब 1969 में उर्दू के अज़ीम शायर मिर्ज़ा असदुल्लाह खां ‘ग़ालिब’ के वफ़ात के शताब्दी वर्ष पर गया शहर में एक कॉलेज की बुनियाद रखी गई, तो यह सिर्फ़ एक संस्थान नहीं, बल्कि एक तहज़ीब, एक सोच, और एक शैक्षिक मिशन की शुरुआत थी।
मिर्ज़ा ग़ालिब कॉलेज, गया, जिसकी स्थापना ख़ान बहादुर अब्दुल हफ़ीज़ की अध्यक्षता में हुई थी और अब्दुस सलाम इसके पहले सचिव बने, आज आधी सदी से भी अधिक समय बाद, एक नए युग में दाख़िल हो चुका है इस युग का नेतृत्व कर रहे हैं गया के प्रतिष्ठित शिक्षाविद और समाजसेवी शब्बी आफरीन शम्सी। शब्बी शम्सी के सचिव पद पर आने के बाद मिर्ज़ा ग़ालिब कॉलेज की सूरत बदल गई है। कॉलेज का शैक्षिक माहौल, शिक्षक–कर्मचारी की नियमित उपस्थिति, और प्रशासनिक पारदर्शिता अब इस संस्था की पहचान बन चुकी है। यह कॉलेज भले ही मॉर्निंग शिफ्ट में चलता हो, मगर सचिव साहब दोपहर ढाई बजे तक अपने चैम्बर में मौजूद रहते हैं। जब नेतृत्व सक्रिय हो, तो अधीनस्थ निष्क्रिय नहीं रह सकते। यही वजह है कि कॉलेज में अनुशासन अब सिर्फ़ एक नियम नहीं, बल्कि व्यवहार का हिस्सा बन चुका है। शब्बी शम्सी की कार्यशैली में सबसे प्रमुख विशेषता है — ईमानदारी, पारदर्शिता और लगन। वे न सिर्फ़ सचिव के रूप में काम कर रहे हैं, बल्कि एक मार्गदर्शक, एक प्रेरणा स्रोत और एक आदर्श नेतृत्वकर्ता बनकर उभरे हैं। 21 नवंबर 2023 को एक राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम में शब्बी शम्सी को सम्मानित किया गया, और इस कार्यक्रम में वे गया से इकलौते शिक्षाविद थे जिन्हें यह प्रतिष्ठा मिली। यह सिर्फ़ उनकी नहीं, बल्कि पूरे गया और मिर्ज़ा ग़ालिब कॉलेज की उपलब्धि है। शब्बी शम्सी को हाल ही में मगध विश्वविद्यालय का सीनेट सदस्य नामित किया गया है। यह पद न केवल उनकी योग्यताओं की स्वीकृति है, बल्कि इस बात का संकेत है कि गया से निकलकर एक शिक्षाविद राष्ट्रीय शैक्षिक ढांचे को दिशा देने के लिए तैयार है। उनका अनुभव, उनकी ईमानदार सोच और उनके प्रशासनिक कौशल निश्चित रूप से विश्वविद्यालय के विकास में मील का पत्थर सिद्ध होंगे। शब्बी शम्सी का पैतृक गांव काको (जहानाबाद) है। वे प्रसिद्ध लेखक और अदीब अलमा लतीफ़ शम्सी के छोटे भाई सैयद आरिफ़ शम्सी के सबसे छोटे पुत्र हैं। अपनी जड़ों से गहरा लगाव और शिक्षा के प्रति प्रतिबद्धता ही उनकी सबसे बड़ी ताक़त है। बोधगया और गया की कई सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं में उनकी भागीदारी सराहनीय है। वे जहाँ भी होते हैं, एक सकारात्मक ऊर्जा और प्रभाव छोड़ते हैं। शब्बी शम्सी आज सिर्फ़ एक नाम नहीं, बल्कि एक विचार हैं—कि बदलाव संभव है, अगर नेतृत्व ईमानदार हो, सोच स्पष्ट हो, और नीयत सच्ची हो। मिर्ज़ा ग़ालिब कॉलेज गया की मौजूदा तरक़्क़ी इसकी गवाही देती है। गया, काको और मगध क्षेत्र को शब्बी शम्सी जैसे शिक्षाविद पर गर्व है, जो शिक्षा को सिर्फ़ नौकरी नहीं, बल्कि क़ौमी तरक़्क़ी का रास्ता मानते हैं।