एक रौशन चिराग़, जो बुझकर भी रोशनी दे गया याद में प्रो. डॉ. अब्दुल वहाब अशरफ़ी साहब



एक रौशन चिराग़, जो बुझकर भी रोशनी दे गया याद में प्रो. डॉ. अब्दुल वहाब अशरफ़ी साहब
(सैयद आसिफ इमाम काकवी ख़ास रिपोर्ट, दुबई से )
“कुछ चिराग़ बुझकर भी मुनव्वर रहते हैं,
कुछ लोग रुख़सत होकर भी रूहों में बसते हैं।
2 जून, एक तारीख़ जो सिर्फ़ एक शख़्स के जन्म की नहीं, बल्कि उर्दू तहज़ीब और अदब की रौशन तारीख़ का आग़ाज़ है। आज जब हम प्रो. डॉ. अब्दुल वहाब अशरफ़ी साहब की यौमे पैदाइश पर उन्हें याद कर रहे हैं, तो दरअसल हम अपनी ज़बान, तहज़ीब और तालीम के उस दौर को सलाम कर रहे हैं जिसमें उन्होंने उजाला भरा। 1936 में बिहार के जहानाबाद ज़िले के क़स्बा काको के बीबीपुर गांव में जन्मे अशरफ़ी साहब ने वो मुकाम हासिल किया, जहां सिर्फ़ मेहनत नहीं, ख़ुलूस और इल्म की रौशनी पहुँचती है। आलोचना की दुनिया में वो सिर्फ़ एक नाम नहीं, बल्कि एक स्कूल ऑफ़ थॉट बन गए। उनकी किताब “तारीख़-ए-उर्दू अदब” को साहित्य अकादमी सम्मान से नवाज़ा जाना इस बात की गवाही है कि उन्होंने उर्दू अदब को एक नई बौद्धिक ऊँचाई दी। रांची यूनिवर्सिटी के उर्दू विभाग में बतौर अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने जिस तरह इस शहर को अदबी नक़्शे पर उभार दिया, वो काबिले-तारीफ़ है। उनके घर में सजने वाली मुशायरे और गोष्ठियाँ, नए लहजों को जन्म देती थीं। ‘तारीख़-ए-अदबियात-ए-आलम’ जैसी किताब उन्हीं अदबी सोच की पैदाइश थी। वहाब अशरफ़ी सिर्फ़ आलोचक नहीं थे, वो एक शानदार शायर, अफ़साना निगार, पत्रकार और फ़िक्र देने वाले उस्ताद थे। वो न किसी के मुरीद थे और न किसी के साए में चले उन्होंने अपनी राह खुद बनाई, अपने उसूल खुद तय किए और उसी पर अडिग रहे। सरकारी ओहदों पर रहते हुए भी उन्होंने कभी अदबी उसूलों से समझौता नहीं किया। यही वजह है कि वो आज भी नौजवानों के लिए इल्मी और ज़मीनी रोल मॉडल बने हुए हैं। उनकी आख़िरी किताब ‘तारीख़-ए-अदब-ए-उर्दू’ जब छपी, तो उसका इंतिसाब भी इश्क़ और अदब का दस्तावेज़ बन गया। डॉ. क़ासिम ख़ुर्शीद साहब के नाम उस किताब की मन्सूबगी, और डॉ. क़ासिम ख़ुर्शीद साहब का जवाब दोनों ही अदब की रवायत और दोस्ती की सच्चाई का जिंदा सबूत हैं।
“तुम्हारी याद के जुगनू हैं मेरी आँखों में,
तुम्हारी याद से सारा मकान रौशन है।
काको की सरज़मीन ने जहां बीबी कमाल (रह.), अता काकवी और आज के दौर में शरजील इमाम जैसे नाम दिए, वहीं प्रो. अशरफ़ी साहब इस सिलसिले की सबसे रौशन और बुलंद कड़ी बनकर उभरे। उनका रूहानी रिश्ता इस मिट्टी से इतना गहरा था कि उनकी हर सोच, हर तहरीर में इस तहज़ीब की ख़ुशबू महसूस होती है। आज, जब उर्दू को हाशिए पर डालने की कोशिश हो रही है, तब अशरफ़ी साहब की ज़िंदगी हमें आवाज़ देती है ज़बान को सिर्फ़ पढ़ो नहीं, जियो। इल्म को सिर्फ़ हासिल करो नहीं, फैलाओ।” उनके अफ़कार, उनकी किताबें और उनकी शख़्सियत आने वाली नस्लों के लिए एक नूरानी नक़्शा हैं। 15 जुलाई 2012 को उन्होंने इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कहा, मगर उनकी मौजूदगी आज भी हमारे लफ़्ज़ों, ज़मीर और तहज़ीब में सांस ले रही है। उन्हें याद करना महज़ एक रस्म नहीं एक अदबी अहद है। आइए, उनके यौमे पैदाइश पर हम ये वादा करें कि हम अपनी ज़बान, अपने अदब और अपने उस्तादों की रोशनी को बुझने नहीं देंगे।
ख़िराज-ए-अक़ीदत