47 वें वैवाहिक वर्षगांठ के अवसर पर रसिक मित्रों ने कुछ प्रेम और शृंगार के गीत /ग़ज़ल सृजित किए हैं |

मेरे 47 वें वैवाहिक वर्षगांठ के अवसर पर रसिक मित्रों ने कुछ प्रेम और शृंगार के गीत /ग़ज़ल सृजित किए हैं |
उनकी 2-2 रचनाएं रोज़ प्रस्तुत करने का इरादा है|
इस शृंखला में आज बाबा बैद्यनाथ झा और सरफ़राज़ हुसैन फ़राज़ की रचनाएं ( गीत और नग़मा) प्रस्तुत है | मित्रगण आनन्द उठायें —
पायल की झनकार
आधार- लावणी छन्द=16-14 का मात्राक्रम
आकर्षित करती है तेरा,यह मोहक शृंगार सखे।
सुनकर मन उद्वेलित होता,पायल की झनकार सखे।।
सावन का यह मस्त महीना,खुशियाँ देने आया है।
भँवरे का गुंजन भी मन को,अनायास उकसाया है।
करना चाहूँ योग-साधना,आज नहीं हो पाता है।
मन केन्द्रित हो नहीं सके तो,ध्यान भंग हो जाता है।
लगता है हो गया मुझे क्या,शायद तुझसे प्यार सखे।
सुनकर मन उद्वेलित होता,पायल की झनकार सखे।।
हम रिमझिम बून्दों में चलकर,उपवन में झूले झूलें,
कजरी के गीतों को गाकर,दुनिया की बातें भूलें।
अमर रहेगा प्यार हमारा,इसकी हम कसमें खाएँ।
सुख-दुख में हम अविचल रहकर,सांसारिक हर सुख पाएँ।
समय आज अनुकूल देखकर,करते हैं अभिसार सखे।
सुनकर मन उद्वेलित होता,पायल की झनकार सखे।।
चार दिनों का यौवन होता,इसका हम उपभोग करें।
जीवन स्वस्थ बनाना है तो,हम भी प्रतिदिन योग करें।
छन्दों में हम गीत बनाकर,मंचों पर स्वर में गाएँ।
आपस का विद्वेष मिटाकर,जग में भी खुशियाँ लाएँ।
कैसे कीर्ति अमर हो पाए,इसपर करें विचार सखे।
सुनकर मन उद्वेलित होता,पायल की झनकार सखे।।
बाबा बैद्यनाथ झा
2
🌹🌹🌹🌹नग़मा 🌹🌹🌹🌹
निगाहों में छाने लगी कैफ़ो-मस्ती।
तुम्हें देखकर खिल उठी दिल की बस्ती।
ह़सीं कोई तुम सा नज़र में न आए।
किसी की भी सूरत न अब मुझको भाए।
नज़र तुम पे पड़ते ही कहने लगा दिल।
लुटा दूं मिरी जां मैं तुम पर ये हस्ती।
तुम्हें देखकर खिल उठी दिल की बस्ती।
निगाहों में बढ़ने लगी कैफ़ो-मस्ती।
तुम्हारे बिना चैन पल भर नहीं अब।
तुम्हीं पर फ़िदा हैं दिल-ओ-जां नज़र सब।
तुम्हारे बिना अब न होगा गुज़ारा।
मिटेगी तुम्हीं से मिरे घर की पस्ती।
तुम्हें देखकर खिल उठी दिल की बस्ती।
निगाहों में बढ़ने लगी कैफ़ो-मस्ती।
हर इक ह़ुस्न-आरा इधर हो के गुज़रा।
मगर कोई भी दिल में ऐसे न उतरा।
तुम्हारे लिए है फ़क़त चांद वरना।
मुह़ब्बत हमारी नहीं इतनी सस्ती।
तुम्हें देखकर खिल उठी दिल की बस्ती।
निगाहों में छाने लगी कैफ़ो-मस्ती।
निगाहों में छाने लगी कैफ़ो-मस्ती।
तुम्हें देखकर खिल उठी दिल की बस्ती।
सरफ़राज़ हुसैन फ़राज़ पीपलसाना मुरादाबाद।
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शुक्रिया