पुस्तक समीक्षानिनाद: भावों की वैविध्यता


‘निनाद’ डॉ० सुबोध कुमार झा का तीसरा हिन्दी काव्य-संग्रह है। इसके प्रकाशन का कार्य प्रिन्सेप्स पब्लिशिंग, छत्तीसगढ़ द्वारा किया गया है।
निनाद काव्य संग्रह का यह संस्करण सामाजिक, आध्यात्मिक, व्यवहारिक तथा देशप्रेम व राष्ट्र-भक्ति की भावना से सराबोर हैं। एक तरफ यह काव्य-संकलन मानव के जीवन और उसकी सोच के भीतर झांकने का मौका प्रदान करती है, साथ ही, दूसरी तरफ यह काव्य-धारा के द्वारा आधुनिक सामाजिक जीवन शैली एवं शैक्षणिक अराजकता पर व्यंग्यात्मक प्रहार भी करती है। विषय-वस्तु जो भी हो परन्तु लेखन के भावों में चट्टानों को चीर कर बहते निर्झर की ध्वनि और चट्आनों से टकराव के नाद का संगीत भी है1 शायद यही वजह रही होगी की इस काव्य-संग्रह का शीर्षक ‘निनाद’ रखा गया है।
‘निनाद’ काव्य-संग्रह में कवि ने अपने जीवन के मीठे-कड़वे अनुभवों को काव्य रचना द्वारा स्वाभाविक तथा स्पष्ट अभिव्यक्ति प्रदान की है। कवि डॉ० सुबोध कुमार झा ने यह कृति अपने गुरू व स्वजनों की असीम कृपा को समर्पित किया है।
प्रस्तुत काव्य-संग्रह ‘निनाद’ में कुल 36 कविताओं की सूची है। इन कविताओं में आशा, राग, प्रेम, सौंदर्य, आधुनिकता, दर्शन, देशभक्ति, अन्तर्द्वन्द, परम्परा, विरह तथा आध्यात्मिकता व संवेदनाओं को मार्मिक एवं व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत किया है। इस काव्य-संग्रह की पहली कविता है ‘गिरिराज हिमालय रोता है’ इसमें कवि ने पर्वतराज हिमालय की टीस व दर्द का मार्मिक चित्रण किया है। यह कविता सन् सैंतालिस की भू-सामरिक स्थिति का भान कराती हुई दर्शाती है कि किस प्रकार तत्कालिन भारतवर्ष के चालिस करोड़ हिमालय पुत्रों ने हिमालय की आहों को नजरअंदाज किया और राजनैतिक सुख-सज्जा में लिप्त होकर भारतवर्ष की अस्मिता तथा सम्पदा की लूटपाट में लिप्त रहें और बूढ़े जर्जर तन पर नित नए घाव देते गए। यह कविता देशप्रेम व देशभक्ति की सीमा से आगे जाकर मातृभूमि की करूणा और प्रेम को मार्मिकता प्रदान करती है।
कवि ने अपनी दूसरी कविता ‘सवा अरबों से कह दो…’ में भारत की सवा अरब जनता को ललकारते हुए कहा है कि भ्रष्टाचारियों व गद्दारों के कारण पूर्ण स्वाधीनता अभी शेष है। ये घोटालेबाज हम सवा अरब लोगों को गुलाम बनाए रखना चाहते हैं इसलिए सच्चे सुराज हेतु हमें आतंकवाद तथा राजनैतिक भ्रष्टाचारियों से लोहा लेना पड़ेगा। यह संकल्प सवा अरब लोगों को दृढ़ता से लेना होगा
कवि अपनी तीसरी कविता ‘उत्कृष्ट याचक’ में राजनेताओं की कुटिलता तथा भ्रष्टाचार को उजागर किया है। कवि ने वोट की भिक्षा माँगते तथा स्व में लिप्त राजनेता को झोला लिए हर पाँच वर्ष पर आने वाले भिक्षुक के रूप में दर्शाया है। यह राजनैतिक व्यंग और देशप्रेम की उत्कृष्ट कविता है। चौथी कविता, ‘जलते अंगार’ में क्रांति का अलख जगाते हुए कवि संकेत करते हैं कि सत्ताधारी भ्रष्टचारियों के द्वारा जो जख्म हमें मिले हैं असमें जलते अंगारे अर्थात क्रांति से इन सत्ताधारी जीवाणुओं का नाश संभव है। पाँचवी कविता ‘सपनों का तो हश्र यही है’, में कवि ने सामाजिक बुराईयों यथा छूआछूत, जात-पात, ऊँच-नीच पर कुठाराघात किया है। साथ ही देशहित में संविधान के पालन को संबल प्रदान करने की बात कही नहीं है। यह कविता राजनीतिक अनाचार को स्पष्ट करती है। छठी कविता, ‘साम्प्रदायिकता का विष’ कविता में कवि दंगा तथा अराजकता के लिए दोषी राजनेताओं को कठघरे में खड़ा करते हैं और भ्रष्ट राजनैतिक विचारों को तज कर धरा पर आकाशगंगा उतारने की बात करते हैं जहाँ छोटे-बड़े सभी सितारें एक साथ मिलकर रहेंगे।
काव्य-संग्रह की सातवीं कविता ‘शिक्षा प्रणाली और बेकारी’ में कवि शैक्षणिक अराजकतावाद पर गंभीर चोट करते हैं तथा विद्यार्थियों को स्वयं के सर्वांगीण विकास को बल प्रदान कर योग्यता के द्वारा बेकारी तथा बेरोजगारी के शमन का मार्ग दर्शाते हैं। आँठवी कविता ‘बेहतर खामोशी अब धरना’ में कवि ने सागर को गागर में भरने का काम किया है। इस कविता में वर्ग-विभेद व अत्याचार के खात्में के लिए धर्म के ठेकेदारों के प्रति खामोशी धरने की बात कहीं है। नौवीं कविता ‘चिंताओं का सलीब’ है जिसमें परेशानीयों के सलीब से छूटकारा पाने हेतु चिंताओं को तिलांजली देने की बात कहीं गई है। दसवीं कविता ‘नुकीली यादें’ में कवि प्रेमी-मन की टीस व व्यथा की मार्मिक चर्चा द्वारा सताए जाने की नियति को दर्शाते हैं।
ग्यारहवीं कविता ‘अंतर्द्वंद’ में कवि ने मन की उद्वेलना के द्वंद को दर्शाया है और अंतर्मन की किंकर्तव्यविमूढ़ता को स्पष्ट किया है। बारहवीं कविता ‘क्या यही तेरी आकांक्षा है?’ में कवि ने सांकेतिक रूप से भारतीय जनता को ललकारा है जो उपहास का कारण बनी हुई है। यह आलोचनात्मक तरिके से सुधार को गति देती कविता है। तेरहवीं कविता ‘परिवेशगत संतृप्ति’ में प्रकृति, प्रेम और विरह को प्रदर्शित किया गया है। चौदहवी कविता ‘मृगमरीचिका’ लघु किन्तु अद्भूत कविता है, जिसमें आत्मा, परमात्मा के अंतर्द्वंद तथा परमब्रह्म में अंतिम विलिनता को शब्द प्रदान किया है। इसी कड़ी में पंद्रहवीं कविता ‘नई बहारें’ नूतन वर्ष की नूतन अभिलाषा एवं नई बहारों को शब्द द्वारा आभास कराया है। सोलहवीं कविता ‘आधुनिकतम छात्र’ में विद्यार्थियों की मानसिक विपन्नता को प्रकट किया है। सत्रहवीं कविता ‘दोस्ती शुद्धीकरण’ मित्रता के दायरे एवं मित्र के प्रोत्साहन द्वारा सच्चे सपूत बनने को बताया है। अठारहवीं कविता ‘ज्वालामुखी व्यक्तित्व’ एक सजग व्यक्तित्व को स्पष्ट करती दिखती है। उन्नीसवीं कविता ‘परवशता’ दार्शनिकता और कविता का अद्भूत नमूना है।
इसी क्रम में बीसवीं कविता है ‘युवा दिवस’ जो युवाओं को विवेक से विवेकानंद बनने की राह दर्शाता है। इक्कीसवीं कविता है ‘शिक्षक दिवस की धूम’ जो शिक्षक हृदय की चुनौतियों को दर्शाता है। बाइसवीं कविता ‘अब कहाँ रहीं वो दिवाली’ में आधुनिकता और परम्परा के भेद का वर्णन है, अगली तेइसवीं कविता है ‘सरस्वती पूजा’ जो फाल्गुन और ज्ञान के मिलन को दर्शाता है। चौबीसवीं कविता है ‘ना परिचय की सीमा टूटी’ जो प्रेम तथा मिलन को विस्तृत आयाम देती है। पच्चीसवीं कविता है ‘थपेड़े’ जो मन के कसक को शब्द देती हुई दिखती है। छब्बीसवीं कविता ‘मासूम सूरत’ सूरज और धरा के बीच की तपिश की चर्चा करती है। सताइसवीं कविता है ‘इगों का टकराव’ इसमें अहंकार द्वारा प्रेम के नाश को बताया गया है। अठाइसवीं कविता है ‘मरने के भी आसार नहीं’ यह निर्गुण कविता है जिसमें अद्भूत प्रतीक हैं। उन्तीसवीं कविता है ‘मनमीत’ जो सच्चे प्यार के बारे में है। तीसवीं कविता है ‘मॉडर्न प्यार’ जो प्रेम के आधुनिक यथार्थ की वास्तविकता को बतलाती है। बत्तीसवीं कविता है ‘वफा का अधूरा गाना’ यह अधूरे प्रेम की व्यापकता को दर्शाता है। तैंतीसवी कविता है ‘नया साल है, नई कहानी’ यह भारत देश के लिए अपेक्षित किए गए कार्यों की चर्चा करता है। चौंतीसवी कविता है ‘राणा तुम तो सदा अमर हो’ यह वीररस की कविता है। पैंतीसवीं कविता है ‘सुहाना सफर’ जो जीवन के मर्म को दर्शाता है और छत्तीसवीं कविता ‘ दीपों की अवलि है न्यारी’ में दीपावली और रंगोली के साथ राजा राम के अवध पधारने की घटना का वर्णन है।
‘निनाद’ नामक इस काव्य-संग्रह में कहीं प्रेम और विरह है; तो कहीं संयोग और वियोग हैं, कहीं प्रेम की सकारात्मकता है तो कहीं आधुनिकता की नाकारात्मकता। कवि ने मानव हृदय के सभी भावों का चित्रण तथा शब्दांकन इस काव्य-संग्रह में किया है जो वाकई में तारीफ के काबिल है।इस काव्य-संग्रह में शृंगार रस, वात्सल्य रस, वीर रस, हास्य रस, करूण रस की प्रधानता के साथ उपमा तथा अलंकारों का भी यथास्थान प्रयोग हुआ है जो कवि के ज्ञान तथा भावों की गहराई को स्पष्ट करती है।
मुझे अति प्रसन्नता और गर्व की अनुभूति हो रही है कि मैं ऐसी पुस्तक की समीक्षा का प्रयास कर रहीं हूँ जो खुद ‘गागर में सागर’ है। ऐसी रचना के लिए प्रो० (डॉ०) सुबोध कुमार झा को साधुवाद । प्रेम की सूक्ष्मता और विस्तिर्णता को कवि ने बड़े ही व्यवहारिक, सरल एवं सहज तरिके से प्रस्तुत किया है।
डॉ० सुमन कुमारी,
सहायक प्रघ्यापिका एवं अध्यक्ष,
दर्शन शास्त्र विभाग,
एस० एन० सिन्हा कॉलेज, जहानाबाद