निनाद: अंतर्मन की चेतना का महाकाव्य



जब कोई रचनाकार अपने शब्दों में समाज का आईना दिखाए, राष्ट्र की पीड़ा को स्वर दे, और मानव-मन की गहराइयों को कविता के माध्यम से उजागर करे तो उसकी कृति केवल साहित्य नहीं, सृजन का एक जीवंत अनुभव बन जाती है। डॉ. सुबोध कुमार झा द्वारा रचित ‘निनाद’ एक ऐसा ही काव्य-संग्रह है, जो हृदय में उतरता है और आत्मा को आंदोलित करता है।
यह डॉ. सुबोध कुमार झा का तीसरा हिंदी काव्य-संग्रह है, जो सामाजिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संदर्भों को स्पर्श करता हुआ पाठकों को एक व्यापक अनुभूति देता है। ‘निनाद’ नाम अपने आप में ही उस आंतरिक स्पंदन का प्रतीक है, जो कवि के अंतस से फूटकर समाज के प्रत्येक कोने तक गूंजता है।
इस संग्रह की कुल 36 कविताएँ विविध विषयों को समेटे हुए हैं—देशप्रेम, दर्शन, प्रेम, विरह, आधुनिकता, शिक्षा, युवाओं की मनोदशा, सामाजिक कुरीतियाँ, आत्ममंथन और अध्यात्म। हर कविता में एक सशक्त विचार है, एक सच्चा भाव है और एक ईमानदार स्वर है।
पहली कविता ‘गिरिराज हिमालय रोता है’ में कवि ने राष्ट्र की आत्मा हिमालय को सजीव बना दिया है, जो देश की उपेक्षा, लूट और विघटन से कराह रहा है। यह कविता मात्र प्रतीक नहीं, एक प्रबल राष्ट्रीय पुकार है। दूसरी कविता ‘सवा अरबों से कह दो’ सीधे जनमानस को संबोधित करते हुए भ्रष्टाचार और राष्ट्रविरोधी ताकतों के विरुद्ध खड़े होने का आवाहन करती है।
कवि की दृष्टि केवल राजनीति तक सीमित नहीं, वह सामाजिक ढाँचे की विसंगतियों को भी उजागर करती है। ‘सपनों का तो हश्र यही है’ जैसी कविताएँ छूआछूत, जातिवाद और असमानता पर गहरी चोट करती हैं। ‘सांप्रदायिकता का विष’ में कवि नेताओं के स्वार्थ से उत्पन्न दंगों पर करारा प्रहार करते हैं और एक समरस, समभावमयी समाज की कल्पना करते हैं।
डॉ. सुबोध कुमार झा की कविताएँ जहाँ एक ओर सामाजिक यथार्थ का आइना हैं, वहीं दूसरी ओर वे मानवीय संवेदनाओं की सूक्ष्म परतों को भी बख़ूबी उकेरती हैं। ‘नुकीली यादें’ और ‘मनमीत’ जैसी कविताओं में प्रेम की टीस, वियोग की कसक और आत्मा की पुकार को बड़ी संवेदनशीलता से शब्दबद्ध किया गया है। ‘मृगमरीचिका’ और ‘परवशता’ जैसी कविताएँ दार्शनिक ऊँचाईयों को छूती हैं और आत्मा-परमात्मा के संबंधों पर गूढ़ चिंतन प्रस्तुत करती हैं।
शिक्षा और युवा पीढ़ी को लेकर कवि की चिंता भी स्पष्ट है। ‘शिक्षा प्रणाली और बेकारी’ तथा ‘आधुनिकतम छात्र’ में न केवल आज की शिक्षा-व्यवस्था की खामियों को रेखांकित किया गया है, बल्कि समाधान की राह भी सुझाई गई है। ‘युवा दिवस’ में विवेक और चेतना के साथ कर्मशीलता का संदेश दिया गया है।
काव्य-संग्रह की भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और संप्रेषणीय है। अलंकारों का यथोचित प्रयोग, प्रतीकों की सजीवता और उपमाओं की गहराई इस संग्रह को एक उच्च साहित्यिक स्तर प्रदान करती है। श्रृंगार, करुण, वीर, हास्य और वात्सल्य इन सभी रसों का सुंदर संतुलन ‘निनाद’ को एक बहुरंगी काव्यात्मक अनुभूति बनाता है।
डॉ. सुबोध कुमार झा का यह काव्य-संग्रह समकालीन हिंदी कविता को नई दिशा देता है। वे न केवल एक सजग कवि हैं, बल्कि संवेदनशील विचारक भी हैं, जिनकी लेखनी में राष्ट्र की पीड़ा है, समाज का विवेचन है और आत्मा की पुकार भी। ‘निनाद’ उनकी कवि-चेतना की एक परिपक्व अभिव्यक्ति है, जो साहित्यप्रेमियों के हृदय को छूने की सामर्थ्य रखती है।
इस उत्कृष्ट काव्य-रचना के लिए डॉ. सुबोध कुमार झा को हार्दिक बधाई एवं साधुवाद। उन्होंने जो भावों का सागर इस ‘निनाद’ में समेटा है, वह निश्चय ही हिंदी साहित्य के आकाश में एक स्थायी गूंज बनकर रहेगा। हमें आशा है कि उनकी यह रचना आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेगी और हिंदी कविता को नई ऊंचाइयों तक पहुँचाएगी।
स्निग्धा,
शोधार्थी,
स्नाकोत्तर,अंग्रेजी विभाग,
मगध विश्वविद्यालय, बोध गया, बिहार
पुस्तक परिचय
शीर्षक: निनाद
विधा: काव्य संकलन
कवि: डॉ० सुबोध कुमार झा
प्रकाशक: प्रिन्सेप्स प्रकाशन
पहला संस्करण :2025
मूल्य: ₹ 99/-
कॉपीराइट – डॉ सुबोध कुमार झा
ISBN: 978-81-9B4900-9-4