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✍️✍️ मानसी सिंह


मेरी सीढियां भी मुझपर इठलाती हैं,
मेरी सीढियां भी देख खिलखिलाती हैं।
मेरी सीढियां मुझे कभी कोसती नहीं,
मेरी सीढियां मुझे देख रोती नहीं।
वो सदैव इतराती हैं!
पता है क्यों?
मुझे मेरी सीढ़ियां अतिप्रिय हैं,
मुझे मेरी सीढ़ियां मेरी जान हैं।
मुझे अपनी सीढ़ियों पर अभिमान है,
मुझे मेरी सीढ़ियों पर नाज है।
आख़िर क्यूं ना हो गुरुर,
जिन्होंने मेरा साथ दिया, वो उनके साथ है।
उनका विश्वास उनके साथ है,
इसलिए मेरे शुभचिंतकों का मुझपर नाज है
और वो मेरे फ़रिश्ते हैं,
मेरे ईश्वर हैं; मेरे सरताज हैं…..!!✍️✍️ मानसी सिंह