नहि दरिद्र कोऊ दुखी न दीनानंदलाल दूबे


मौत दे दे बदनसीबी न दे,भगवान किसी को गरीबी न दे- ये पंक्तियां बहुत कुछ सोचने के लिए विवश करती हैं। गरीबी का जहर जिसने चखा है, वही समझ सकता है कि गरीब के लिए अपनी इच्छाएं,अपनी भावनाएं कोई मायने नहीं रखती, सम्मान – समानता जैसे शब्द उसके लिए बेमानी हो जाते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि आर्थिक आजादी के बिना राजनीतिक आजादी का बहुत अधिक महत्व नहीं है।यह तथ्य राष्ट्र और व्यक्ति दोनों पर समान रूप से लागू होता है।
गरीबी एक जटिल समस्या है। इसके कई पहलू तथा कारण हैं। सबसे व्यापक रूप में इस्तेमाल की जाने वाली गरीबी की परिभाषा आर्थिक गरीबी पर केंद्रित है।यह परिभाषा गरीबी को एक व्यक्ति द्वारा अर्जित धन की मात्रा से मापती है।
गरीबी के अंतर्गत इसके विभिन्न प्रकारों को शामिल किया जाना चाहिए तथा यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि भूख, आश्रय का न होना, निरक्षरता और स्कूल तक पहुंच न होना, बीमारी की स्थिति में डॉक्टर से न दिखा पाना, भविष्य के लिए भयभीत होना, एक दिन में एक जीवन जीना और अपने नियंत्रण से परे चीजों, वस्तुओं के सामने पूरी तरह से खुद को शक्तिहीन तथा फंसा हुआ महसूस करना- इसके दुष्परिणाम हैं।
हीरे के कोण की तरह गरीबी के कारण यद्यपि बहुआयामी प्रतीत हो सकते हैं तथापि उन्हें दो प्राथमिक श्रेणियों में बांटा जा सकता है – संस्कृति और मूल्यहीनता के झूठ पर विश्वास करना। गरीबी को चाहे जिस प्रकार मापा जाय हमारा समग्र विकास मॉडल गरीबी संस्कृति के बाह्य कारकों को संबोधित करता है तथा समुदायों और परिवारों को भोजन, स्वच्छ जल स्रोतों तक पहुंच प्राप्त करने, सकारात्मक और स्वस्थ रहने के वातावरण का निर्माण करने और शैक्षिक अवसरों का लाभ उठाने में सहायता करता है।
आजादी के बाद से ही अब तक अपने देश में गरीबी दूर करने के लिए केंद्रीय और राज्य सरकारें कोशिश करती रही हैं। इसके लिए अनेक योजनाएं चलायीं जा रही हैं और गरीबी दूर करने में सफलता भी मिली है। इसके बावजूद इसके लिए लाभुकों को अपने अंदर आत्मविश्वास जागृत करते हुए सुविचारित योजना के साथ कटिबद्ध होने की आवश्यकता है। तभी राम राज्य की परिकल्पना साकार होगी- नहि दरिद्र कोऊ दुखी न दीना।
लाखन डिहरा, डुमरांव, बक्सर