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छठ का संदेश:सर्वमंगल की भावना*       *दिल्लू सिंह

लोक आस्था का महाव्रत छठ मानव मात्र के लिए सार्वभौमिक संदेश देता है। सदियों पूर्व हमारे पूर्वजों ने भेदभाव रहित समाज तथा स्वच्छता- दैहिक, जलाशयों -नदी, तालाब सहित मन की पवित्रता को कितना महत्व दिया है,इस तथ्य का यह व्रत स्वतः उद्घोष करता है। अर्घ्य देने के लिए जलाशयों के आसपास गंदगी देख छठी मइया कुपित होकर कहती हैं – “कोपी कोपी बोलेली छठी मइया सुन  सेवक लोग ,मोरा घाटे दुबिया उपज गइले मकड़ी बसेर लेले।”  इस समय शुरू स्वच्छता अभियान गली – पगडंडी से लेकर सड़क तक उदीयमान सूर्य के अर्घ्य देने के बाद ही रुकता है।इसी तरह पहला अर्घ्य अस्ताचलगामी भगवान भुवन भास्कर को देना आज की भौतिकता की अंधी दौड़ के गाल पर करारा थप्पड़ है जो हानि लाभ के अनुसार किसी को महत्व देता है।
व्रती जब छठ घाट के जाने के लिए तैयार होते हैं तो अनुनय भरा गीत गूंज उठता है – “कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाय,पहनी ना महादेव पियरिया दौरा घाटे पहुंचाय”।
हरे बांस की बहंगी,व्रत की पूजन सामग्री सूप,दउरा, केला,मूली, हल्दी,शरीफा आदि वोकल फॉर लोकल यानी स्थानीय उत्पाद की वकालत करते हैं।
  सूर्य देव व्रती से प्रश्न पूछते हैं कि यह वह किसके लिए कर रही है – “हम तोह से पूछीं व्रतिया से केकरा लागी ना,करेलू छठ व्रतिया से केकरा लागि ना” इसका उत्तर देते हुए वह कहती है – वह अपने बेटा-बेटी सहित घर-परिवार, समाज सबके लिए जो सब सूर्य देव के ही हैं,उनकी मंगलकामना के लिए यह व्रत करती है।
   उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देने के लिए व्रती के नयन तरस रहे हैं -“उगा हे सूरज देव भोर भिनसरवा, उग हे सूरज देव भोर भिनसरवा,अरघ के रे बेरवा हो पूजन के रे बेरवा हो”।
   छठ के पारंपरिक लोकगीतों में बेटी की कामना, शिक्षा का महत्व आदि आज के बेटी बचाओ अभियान आदि की याद दिलाते हैं, यथा -” रूनकी झुनकी बेटी मांगिला,पढ़ल पंडितवा दमाद,सभवा बइठन के बेटा मांगिला “।
पवित्रता तो इतनी है कि व्रत का फल सुग्गा ने जूठा कर दिया तो व्रती के कंठ से फूट पड़ता है – “सुगवा के मरबो धनुष से सुग्गा गिरिहें मुरझाय”। जीव-जंतुओं के  प्रति व्रती की भावना समझने की आवश्यकता है।ध्यातव्य है कि इस गीत में सुग्गा का वध या हत्या की बात नहीं हो रही,ऐसा दंड देने की बात हो रही है कि सुग्गा सिर्फ मूर्छित हो,मरे नहीं।
   सच तो यह है कि छठ का संदेश यदि साकार हो जाता है तो शिक्षित ,भेद-भाव रहित, स्वच्छ तथा सर्व मंगलकारी समाज की स्थापना स्वत: हो जायेगी।
          पता – विष्णु नगर आरा

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