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धधकता चित्त

धधकता चित्त

ये भूल मत करना; भूल कर भी,
कि तुम्हारी करतूत भुला दी जाएगी।
मीठी निंदिया समझ कर सुला दी जायेगी।
वक्त आने पर सब समझ जाओगे,
भूलने पर भी बता दी जायेगी?

   सच समुद्र है इसे कब समझोगे,
   यूं हीं कैसे झुठला दी जायेगी?
और जो रो-रो कर गुजारी हो रतिया  कभी,
वो बतिया कैसे बिसरा दी जायेगी?

  और जिसके सीने में अंगार भरा हो,
   बदले की ज्वाला धधक रही हो,
      आंसू लहू बन टपक रहे हों
    वो कैसे यूं ही दफना दी जायेगी?
   
     जो दर्द के साथ जी सकती है
       खून की घूंट पी सकती है,
       वक्त आने पर तू बच लेगा
     बिन बदला वो जी सकती है…?
 
जो सीता बनकर शांत बैठी थी,
  काली रूप में आ सकती है
    प्रेम सुधा बरसाने वाली
  रक्त रंजित पर आ सकती है।

     एक नारी जब रार ठान ले
     घुटनों के बल ला सकती है,
     सीता नहीं काली बनके
   तेरी औकात दिखा सकती है…!!

      मानसी सिंह (अनुसंधायिका)
         स्नातकोत्तर हिंदी विभाग
     मगध विश्वविद्यालय, बोधगया।

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