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कभी-कभी

कभी-कभी

कभी-कभी बुरे वक्त का आना बहुत जरूरी है
कभी-कभी अपनों को आजमाना बहुत जरूरी है।
वैसे तो अपनों पर विश्वास बहुत जरूरी है,
पर कभी-कभी आंखें खोलकर देख लेना बहुत जरूरी है।
क्योंकि कभी-कभी अपनों के भी आप से खास होते हैं,
वैसे में अंतर्मन को समझाना बहुत जरूरी है।

यूं तो बहुत जरूरी है प्रकृति में बदलाव मगर,
पर इन जैसों अपनों को छंट जाना बहुत जरूरी है।
यूं तो तन्हाई आपको तोड़ देता है बहुत अकेले में,
पर इन जैसों के साथ से तो भली कहीं तन्हाई है।

ऊपर-ऊपर हरा भरा; भीतर खालीपन लगता हो,
तब जेहन से अपनों का मिट जाना बहुत जरूरी है।
अपना वो; जो अपना साया की भांति डटा रहे,
बादलों की भांति दोस्तों का ‘ना’ होना बहुत जरूरी है।

वो पेंडुलम घड़ियां दीवारों पर खूब फबती हैं,
इंसानों का आईना सा मन हीं सबका मन लुभाती है।
अपनेपन का ढोंग करे और साथ खड़ा हो गैरों के,
उन जैसों का अपने दिल में जगह गैर जरूरी है।

सावधानी गैरों से तो सदियों से बरती जाती है,
पर अब अपनों पर समयानुसार संदेह बहुत जरूरी है।
जब सांसे भी हैं मोहताज; फिर किसी पर ऐतबार!
इस ऐतबारी अटूट विश्वास का टूटना बहुत जरूरी है।

अग्नि जल पावक गगन समीर जब सारे    छूट जाते हैं,
और अपना मां-बाप; भाई-बंधु जब  यहीं रह जाते हैं,
जब प्रेम प्रकृति; नेह का बंधन कोई साथ नहीं जाता,
ऐसे में सपोलों का क्या पालना बहुत जरूरी है…!!? ✍️✍️

             मानसी सिंह, (अनुसंधायिका)
      कवयित्री,(शब्दाक्षर प्रदेश साहित्य मंत्री)
             स्नातकोत्तर हिंदी, विभाग
       मगध विश्वविद्यालय बोधगया, (बिहार).

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