क्या करें हम ऐसी आजादी का, जहां जीने पर भी पाबंदी है ।


क्या करें हम ऐसी आजादी का, जहां जीने पर भी पाबंदी है ।
यहां केवल पुरुषों की नहीं,
कुछ स्त्रियों की भी सोच गंदी है ।
नवरात्रि के नौ दिन ही क्या,
कन्या पूजन योग्य होती है।
शेष दिनों में वही कन्या क्यों, चीर हरण की पात्र होती है।
कपड़े हमारे छोटे नहीं ,
सोच आपकी छोटी होती है। हमारी तो उम्र छोटी होते हुए भी, नियत आपकी खोटी होती है।
घर में है बहरूपिया,
तो बाहर है दरिंदा ।
यह हम स्त्री ही जाने ,
हम कैसे हैं जिंदा ।
बंध रहे छोटे विचारों में हम, संस्कार से कहीं परे हैं ।
शिक्षा तो,दे दिया पुत्रों को मगर, संस्कार आज भी धरे हैं ।
प्रेम में शामिल दोनों होते,
चरित्र में दाग केवल स्त्री के ।
फिर क्यों न समझे समाज ये बातें,
पीड़ा है जो स्त्री के दिल में ।
कोई नहीं लड़ेगा तुम्हारे लिए ,
ये लड़ाई केवल तुम्हारी है ।
बेटी को सिर्फ लक्ष्मी नहीं ,
अब काली बनने की घड़ी है।
संतानों को केवल शिक्षा की नहीं,
उत्तम संस्कार की जरूरत है। हमें केवल कैंडल मार्च की नहीं, उचित न्याय की जरूरत है ।
हम कहीं भी सुरक्षित नहीं ,
यहां हर ओर नरभक्षी है ,
क्या करें हम ऐसी आजादी का, जहां स्त्री आज भी कैदी है।
_ _ कुमारी अंजली