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बेचारे मां-बापू


बेचारे मां-बापू
आने-दुआने बचा बचाकर
रखा था जो तहखाने में
पढ़-लिखकर कुछ बन जाए बाबू
लगा दिया पढ़ाने में….
पढ़-लिखकर परदेशी हो गए
सफल हुए ज़माने में
पर मिला ना साथ कभी
वो ढूंढते रहे ज़माने में…..
जो था उनके पास सभी तो
लगा दिए पढ़ाने में
बेटा बहु सिनेमा देखे
और मां-बाप पड़ा दलानी में….
हर दुर्दिन से जूझ रहे वो
जूझ रहे बुढ़ापे में
कोई कहता और पढ़ावा
जीवन कट गई ताने में….
भूल गए मेरे मां-बापू ने
क्या-क्या नहीं किया था?
मेरे लिए हर करम-कुकरम
किससे नहीं लड़ा था ?
तरसती आंखें व्याकुल सा मन
टूटी सांसे ताने में
अंत समय भी दूर रहेगा
ना सोचा कभी पढ़ाने में….!!
मानसी सिंह (अनुसंधायिका)
स्नातकोत्तर हिंदी विभाग
मगध विश्वविद्यालय, बोधगया (बिहार).