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——रमेश ‘कँवल’,बिहार प्रशासनिक सेवा के सेवा निवृत पदाधिकारी द्वारा रविवरीय अंक के लिए संकलित—–


प्रदीप राजपूत ‘माहिर’, रामपुर उत्तर प्रदेश की ग़ज़ल
हर तमन्ना मनचली है
धूप में दिन भर जली है
तब कहीं कोशिश फली है
भेड़ियों सब एकजुट हैं
सामने इक लाडली है
टूटना है फूल होकर
सोच में सहमी कली है
हाथ में जुगनू हैं मेरे
कहकशाँ में खलबली है
ज़ेहन में है ज़हर उनके
जिनकी सूरत सन्दली है
दिल भी किसके पीछे भागे
हर तमन्ना मनचली है
मुतमइन हैं आप फिर क्यों
मुस्कुराहट खोखली है
वक़्त आने पर खुलेगी
ये जो मन की पोटली है
भागता है उसके पीछे
दिल भी जैसे अर्दली है
है वही तो क़ाबिल-ए-शक
बात जो लगती भली है
पाँव थकते ही नहीं अब
दिल ने मंज़िल ठान ली है
-प्रदीप राजपूत ‘माहिर’
रामपुर (उ0 प्र0)