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एक शाम ज़ाहिद अबरोल के नाम

30 नवंबर,2024 दिन शनिवार को बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन, कदमकुआँ,पटना में हिमाचल प्रदेश सरकार की द्विभाषी त्रैमासिक पत्रिका जदीद फ़िकरो-फ़न के यशस्वी संपादक श्री ज़ाहिद अबरोल के नाम एक शाम का आयोजन किया गया | इसकी अध्यक्षता रमेश ‘कँवल’ ने की | डॉ एहसान शाम, मुख्य अतिथि और डॉ अनिल सुलभ,अध्यक्ष,बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन तथा डॉ मेहता नगेन्द्र सिंह विशिष्ट अतिथि थे | इस शाम में आयोजित कवि सम्मेलन में श्री अरुण कुमार आर्य, डॉ मोहन तिवारी ‘आनन्द,भोपाल ,डॉ पूनम सिंहा श्रेयसी, शुभचन्द्र सिन्हा, शमा कौसर शमा,ज्योति मिश्रा, बुशरा ,समीर परिमल,सुनील कुमार ने काव्य पाठ किया | ग़ज़लें सुनाईं |   श्रोताओं में बाँके बिहारी साव, डॉ कैसर ज़ाहिदी, विजय कुमार ,एम. आर. मलिक,डॉ नीतू सिंह, इत्यादि शामिल थे |
ग़ज़लों का दौर देर तक चलता रहा | मंच संचालन ज्योति मिश्रा ने शायराना अंदाज में किया | निम्नलिखित अशआर को खूब सराहा गया और लोगों ने दाद ओ तहसीन से नवाज़ा –

हमारे  दिल  की बस्ती में बसा है  जो ज़माने से
ग़ज़ल  के  फूल  खिलते हैं उसी के मुस्कुराने से

नदी   की   तेज़   धारा   में   नहाते  रोज़  हैं लेकिन
किसी  की  याद की ख़ुशबू नहीं जाती नहाने से

आर. पी.  घायल

अभी भी है  हवाओं में अज़ीमाबाद की ख़ुशबू
बुज़ुर्गों की  दुआओं में अज़ीमाबाद की ख़ुशबू

इसी पटना को कहते थे अज़ीमाबाद हम पहले
अभी भी है क़िताबों में अज़ीमाबाद की ख़ुशबू

आर. पी.  घायल

मुझे तुम्हारा आंख चुराना, अच्छा लगता है।
तनिक रूठना फिर मुस्काना,अच्छा लगता है।

छज्जे से छुप छुप कर देखो, मैं देखूं छुप जाओ।
ना-ना कर बांहों में आना, अच्छा लगता है।

मोहन तिवारी आनन्द, भोपाल

सर झुका के क़त्ल का मक़सद न पूछा जायेगा
सर उठा  के   कौन होगा  रूबरू क्या पूछना

क़ातिलों  के बज़्म में अब तक रहे ज़िन्दा हमीं
ये  ख़बर  फैली नहीं  क्यों चार-सू क्या पूछना
         
शुभचंद्र सिन्हा

हवाएँ अब भी लाती हैं हमारे गाँव की ख़ुशबू
वो मिट्टी में सने औ’ धूप में भींगे हुए चेहरे

खिलौने की तरह ख़ामोश बैठे हैं दुकानों में
तुम्हे मिल जायेंगे हर मोड़ पे खोये हुए चेहरे
समीर परिमल

ज़माने के सारे सितम चल पड़े हैं
ज़मीं से फ़लक को क़दम चल पड़े हैं

जनाज़ा जो ‘परिमल’ का निकला गली से
मिलाकर क़दम रंजो-ग़म चल पड़े हैं

© समीर परिमल, पटना

मेरे भीतर जो रहता है  वो कोई  और है शायद,
लहू बन कर जो बहता है  वो कोई और है शायद।

सफलता जो  मिली मुझको  नहीं लगता कि मेरी है,
ये  दिल अक्सर ही कहता है वो  कोई  और है शायद।

@ डॉ० पूनम सिन्हा श्रेयसी

उजाले की मैं ज़ीनत हूँ यही सच है,
अँधेरों की मैं शामत हूँ यही सच है।

अमीरी क्या बिगाड़ेगी भला मेरा,
फकीरी की विरासत हूँ यही सच है।

डॉ० पूनम सिन्हा श्रेयसी

आप अपने हुस्न पर इतना नहीं इतराइये
चार दिन की चॉंदनी है फिर ॲंधेरी रात है

है नहीं कोई गवाही और मुंसिफ है ख़मोश
कौन जाने क़त्ल में अब मेरे किसका हाथ है

अरुण कुमार आर्य

मेरी यादों से भरे ख़त को जलाने वाले 
मेरे क़दमों का तेरे दिल में निशाँ बैठा है

मैं तो मरने के लिए प्यार से तैयार ही हूँ
क्यूँ  लिए हाथों में  तू तीरो-कमाँ बैठा है

—-ज्योति मिश्रा

अब तक आंखों में वो ख़्वाब सुनहरे हैं
प्यार की शीतल छाया में हम ठहरे हैं

ट्रेन खुली तो तुम ने फ्लाइंग किस दे दी
फ़ोन भी करना बोल रहे दो चेहरे हैं 

जिन होटल में ठहरे थे हम साथ तेरे
प्रीत के वास से अब भी सुगंधित कमरे हैं

रमेश ‘कँवल’

ज़ाहिद अबरोल साहब की ट्रेन लेट हो गई थी तो उन्होंने कार से आने का प्रयास किया लेकिन वे रात 8 बजे के बाद ही पटना पहुँच सके | दूसरे दिन वे अपनी शरीके-ज़िंदगी रीटा  अबरोल के साथ मेरे ग़रीबखाने पर तशरीफ़ लाए | उस वक्त की कुछ तस्वीरें शेयर कर रहा हूँ – रमेश ‘कँवल’

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