ग़ज़ल – रमेश ‘कँवल’


ग़ज़ल – रमेश ‘कँवल’
आपका करम हुआ बने जो आप हमसफ़र
आप जब चले गए उदास हो गई नज़र
खो गईं मसर्रतें ख़फ़ा हुईं डगर डगर
सुब्ह दम उदासियां पसर गईं यहां वहां
शाम को दिखी नहीं बुलंद कोई रहगुज़र
आपकी इनायतों से ज़िन्दगी सॅंवर गई
आपका करम हुआ बने जो आप हमसफ़र
इन दिनों मेरी वफ़ा है सख्त इम्तिहान में
मुफ़्लिसी के पैरहन ने कर दिया है दर ब दर
बाख़बर रहे कहाँ वो सूरते-अवाम से
राहबर रहे सभी वतन से हो के बेख़बर
चढ़ रहा विकास की हर एक रोज़ सीढ़ियाँ
राह पर ऊंचाइयों की देश में है हर बशर
तार तार हो गया उरुज पर जो अज़्म था
क्या ‘कँवल’ करे कहो जो ख़ुश नहीं है हमसफ़र
सृजन – 14 मई,2024