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जन्मदिन विशेष डॉ. क़ासिम ख़ुर्शीद  अदब, तहज़ीब और तालीम का रौशन चिराग़…..                                                                                 

                                                                                                                                                                                           सैय्यद आसिफ इमाम काकवी                                                                                                                                                                                    
 
“ये तो रस्म-ए-जहाँ है जो अदा होती है,
वरना सूरज की कहाँ सालगिरह होती है…
                                                                                                                                                                                                           डॉ. क़ासिम ख़ुर्शीद  एक ऐसा नाम जो सिर्फ़ एक शायर, आलोचक या साहित्यकार तक सीमित नहीं है, बल्कि एक ऐसा सच्चा इंसान, एक ईमानदार प्रशासक और एक जागरूक शिक्षक है, जिसने अपने जीवन को क़लम, कर्तव्य और करुणा के नाम कर दिया। यह शेर महज़ तारीफ़ नहीं, बल्कि डॉ. क़ासिम ख़ुर्शीद साहब की संजीदा शख्सियत, अदबी सफ़र और इंसानी मूल्यों की मुकम्मल तस्वीर है। आज, 2 जुलाई  को हम एक ऐसे अज़ीम इंसान का जन्मदिन मना रहे हैं, जिन्होंने काको (ज़िला जहानाबाद, बिहार) की मिट्टी से निकल कर पूरी दुनिया में उर्दू, हिंदी और तालीम की रोशनी फैलाई।  जुलाई, 1966 को बिहार के जहानाबाद ज़िले के काको गाँव में जन्मे डॉ. क़ासिम ख़ुर्शीद न केवल उर्दू और हिंदी के एक सशक्त साहित्यकार हैं, बल्कि वे शिक्षा, प्रशासन और संस्कृति के क्षेत्र में एक प्रेरणास्रोत व्यक्तित्व भी हैं। जन्मदिवस के इस अवसर पर उन्हें दिली मुबारकबाद पेश करते हुए यह कहना ज़रूरी है कि डॉ. क़ासिम ख़ुर्शीद जैसे लोग किसी एक भाषा या क्षेत्र की सीमा में नहीं बंधते  वे एक समग्र सोच, साझा तहज़ीब और मानवीय मूल्यों के वाहक हैं।  बचपन से ही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शायरी और विचारों के ज़रिए क़ासिम साहब ने अहमद फ़राज़, निदा फ़ाज़ली, बशीर बद्र, गोपीचंद नारंग जैसे दिग्गजों के साथ कंधे से कंधा मिलाया। बहरीन, साहित्य अकादमी, सर्वभाषा फेस्टिवल, इन सभी जगहों पर उन्होंने बिहार ही नहीं, पूरे हिंदुस्तान का प्रतिनिधित्व किया। डॉ. क़ासिम ख़ुर्शीद ने उर्दू, हिंदी और अंग्रेज़ी में अब तक 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित की हैं। उनकी लेखनी में भाषा की मिठास, समाज की गहराई, और विचारों की ऊँचाई दिखाई देती है। शायरी, कहानी, आलोचना और नाटक  हर विधा में उनका योगदान उल्लेखनीय है। वे अंतरराष्ट्रीय मुशायरों और साहित्यिक सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं, जिनमें बहरीन, साहित्य अकादमी के सर्वभाषा फेस्टिवल और खाड़ी देशों के मंच प्रमुख हैं। भारतीय लोक सेवा आयोग द्वारा चयनित वर्ग 1 के अधिकारी के रूप में उन्होंने नौ भाषाओं के विभागाध्यक्ष और शैक्षिक दूरदर्शन के निदेशक जैसे महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। उनके निर्देशन में सैकड़ों टेलीफिल्में, वृत्तचित्र, और शैक्षिक कार्यक्रम बने जो बिहार के शैक्षिक परिदृश्य को एक नई दिशा देने में सहायक रहे। डॉ. क़ासिम साहब आज की नई नस्ल के लिए वह मिसाल हैं जो यह सिखाते हैं कि अदब, तालीम और तमीज़ एक साथ कैसे जिया जाता है। उन्होंने साबित किया कि सत्ता में बैठा व्यक्ति भी साहित्य और संस्कृति का सच्चा रहनुमा हो सकता है। वो सिर्फ़ उर्दू के नहीं, इंसानियत के भी सच्चे शायर हैं। उनकी लेखनी में मोहब्बत, उनकी बातों में अदब, और उनके काम में समाज के लिए एक साफ नियत दिखती है। काको गाँव, जहाँ बीबी कमाल (रह.), प्रो. वहाब अशरफी, अता काकवी,  जैसी विभूतियाँ पैदा हुईं, उसी धरती ने डॉ. क़ासिम ख़ुर्शीद जैसा रौशन सितारा देश को दिया है। उन्होंने न केवल अपने गाँव का नाम रौशन किया, बल्कि बिहार और भारत की साझा तहज़ीब को दुनिया के सामने पेश किया। उनकी नर्मदिली, सरलता, और गहराईपूर्ण सोच ने उन्हें न केवल साहित्यिक मंचों पर प्रतिष्ठा दिलाई, बल्कि लोगों के दिलों में भी जगह दी। मशहूर शायर राशिद तराज़ ने उनके लिए जो नज़्म लिखी, वह इस बात की तस्दीक करती है कि डॉ. क़ासिम ख़ुर्शीद किसी औपचारिक इनाम के नहीं, बल्कि अवाम की मोहब्बत और दुआओं के सच्चे हक़दार हैं। वो सिर्फ़ उर्दू के नहीं, इंसानियत के भी सच्चे शायर हैं। उनकी लेखनी में मोहब्बत, उनकी बातों में अदब, और उनके काम में समाज के लिए एक साफ नियत दिखती है।“ऐसे अदीबों का सम्मान करना तहज़ीब की पहचान है। डॉ. क़ासिम साहब का जीवन एक पैग़ाम है  कि अगर नीयत सच्ची हो, सोच रचनात्मक हो, और दिल में ज़माने को बेहतर बनाने की आग हो, तो कुछ भी नामुमकिन नहीं। हम दुआगो हैं कि अल्लाह तआला उन्हें उम्र-दराज़ी दे, सेहत दे और दोनों जहाँ की कामयाबी दे।

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