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एकता  की कलम से —

डा एकता  की कलम से —

हमारे दिल की बस इतनी सी चाहत थी
मैं थक जाऊं जब भी दुनिया की शोर से
लौट तेरे पास जाऊं
जहां ना कोई सवाल हो ना कोई तर्क हो
तेरे गोद में सर रख  कर दुनिया की सारी उलझन को भूल जाऊं
तुम कुछ ना कहो मैं भी कुछ ना कहूं
तुम्हारी आंखों को पढ़ के दिल की धड़कनों को सुन  कर तेरी अनकही हर बात समझ जाऊं
जहां दुनिया की जिक्र हो ना किसी जिम्मेदारी का फिक्र हो
चांदनी रात हो एक दूजे के साथ हो
हमारे दिल की बस इतनी सी चाहत थी
कुछ यू समेट कर रख मुझको मेरी खुशबू भी बिखरे तो तेरे हद में हो तुमसे ही आरंभ हो तुमसे ही अंत हो

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