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एक कलम जो अंधेरे में उजाला करती है – सैयद ताबिश इमाम काकवी को जन्मदिन पर सलाम”

“एक कलम जो अंधेरे में उजाला करती है – सैयद ताबिश इमाम काकवी को जन्मदिन पर सलाम”
सैय्यद आसिफ इमाम काकवी
या रब मेरी क़लम को तू वो रौशनाई दे,
मैं झूठ जब लिखूं तो अंधेरा दिखाई दे।
यह शेर सिर्फ़ एक दुआ नहीं, बल्कि सच्चे और ज़िम्मेदार पत्रकार की पहचान है – और जब बात सच्चे कलमकार की हो, तो सबसे पहले नाम आता है सैयद ताबिश इमाम काकवी का।
आज उनका जन्मदिन है – यह दिन न केवल उनकी उम्र में एक साल और जोड़ता है, बल्कि उस मुल्कपरस्त और सच की पैरवी करने वाली पत्रकारिता के सफर को भी सलाम करने का दिन है, जिसे उन्होंने करीब 30 वर्षों से पूरी ईमानदारी, लगन और बेबाक़ी से निभाया है।
जहानाबाद के ऐतिहासिक और सूफियाना तहज़ीब से भरपूर क़स्बे काको से ताल्लुक़ रखने वाले ताबिश इमाम साहब ने यह साबित कर दिया कि बड़े शहरों से नहीं, बड़े इरादों से पत्रकार पैदा होते हैं। काको जैसे छोटे से इलाके में रहते हुए उन्होंने हिंदी और उर्दू पत्रकारिता को अपनी मेहनत और सच्चाई से एक नई ऊँचाई दी।

ताबिश साहब ने हिंदी अख़बार ‘आज’ से अपने करियर की शुरुआत की, और फिर हिंदुस्तान, क़ौमी तंजीम, संगम, सहारा, हमारा समाज, और पिछले कई वर्षों से ‘इंकलाब’ जैसे प्रतिष्ठित अख़बारों में लगातार अपने तेवर और तर्ज़ के साथ रिपोर्टिंग की।
उनकी रिपोर्टिंग की सबसे बड़ी खूबी है – साहस और ज़िम्मेदारी। चाहे वह सिरथुआ क़ब्रिस्तान पर हमला हो या वक़्फ़ संपत्ति पर कब्ज़ा, ताबिश साहब की कलम ने हमेशा ज़मीर को जगाने वाली आवाज़ उठाई। उनके लेख सिर्फ़ खबर नहीं, तारीख़ का दस्तावेज़ होते हैं।
हीमंत करकरे की शहादत के बाद जब देश के बड़े पत्रकारों को विशेष रूप से रिपोर्टिंग के लिए आमंत्रित किया गया, तब ताबिश साहब की कलम भी ‘आलमी सहारा’ साप्ताहिक में प्रमुखता से छपी। ये उनके तजुर्बे, समझ और राष्ट्रीय स्तर पर उनकी साख का गवाह है।
उन्होंने सिर्फ़ घटनाएं नहीं लिखीं, वक़्फ़ अमलाक की तबाही, कब्रिस्तानों की घेराबंदी, अल्पसंख्यकों की शिक्षा में पिछड़ापन, और उर्दू भाषा की अधिकारहीनता जैसे विषयों पर बेबाक़ और असरदार लेख लिखे जो व्यवस्था को सोचने पर मजबूर करते हैं।
सैयद ताबिश इमाम साहब उन गिने-चुने पत्रकारों में हैं जो पत्रकारिता को नौकरी नहीं, ज़िम्मेदारी समझते हैं। आज जब मीडिया का बड़ा हिस्सा बिकाऊ और पक्षपातपूर्ण हो गया है, ताबिश इमाम की कलम उम्मीद की एक रोशनी की तरह है, जो न ज़ुल्म से डरती है, न झूठ से झुकती है।
हम दुआ करते हैं कि अल्लाह तआला उन्हें तंदरुस्ती, लंबी उम्र और क़लम में और ताक़त अता फ़रमाए ताकि वे यूं ही सच की रौशनी से अंधेरों को चीरते रहें।
ताबिश इमाम सिर्फ़ एक नाम नहीं, एक मिशन हैं।
उनकी लेखनी हम सबके लिए रौशनी का रास्ता है।
जनमदिन की दिली मुबारकबाद और तह-ए-दिल से शुक्रिया,
आप जैसे साहसी और सच्चे क़लमकार को सलाम।
(सैयद आसिफ इमाम काकवी ख़ास दुबई से )

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