नवनिर्माण संस्थान की पहल से ग्रामीण प्रतिभाओं को मिला मंच



खेलकूद, चित्रकला व संगीत प्रतियोगिता में बच्चों ने बिखेरा हुनर, विजेता हुए पुरस्कृत
जहानाबाद।
शहरों के साथ-साथ अब ग्रामीण इलाकों में भी खेल, कला और संगीत के प्रति बच्चों का उत्साह लगातार बढ़ रहा है। इसका जीवंत उदाहरण जहानाबाद प्रखंड के मध्य विद्यालय नोन्ही के प्रांगण में देखने को मिला, जहां नवनिर्माण संस्थान की ओर से ग्रामीण खेल–कला–संगीत उत्थान प्रतियोगिता का भव्य आयोजन किया गया।
प्रतियोगिता के अंतर्गत दौड़, सुई-धागा, चित्रकला एवं संगीत जैसी विभिन्न विधाओं में बच्चों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया और अपनी प्रतिभा का शानदार प्रदर्शन किया। विशेष रूप से सुई-धागा प्रतियोगिता में बड़ी संख्या में बालिकाओं की भागीदारी देखने को मिली, जो काफी रोचक रही। वहीं चित्रकला प्रतियोगिता में बच्चों ने रंगों के माध्यम से अपनी कल्पनाशीलता और रचनात्मकता का अद्भुत परिचय दिया।
शानदार प्रदर्शन करने वाले बच्चों को पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया। पुरस्कार पाकर बच्चों के चेहरे खुशी से खिल उठे। प्रतियोगिता में प्रेशर कुकर, लैपटॉप, मिक्सी सहित अन्य उपयोगी उपहार शामिल थे।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शिजांची कुमारी, विश्वजीत कुमार अलबेला एवं जाने-माने चित्रकार अजय विश्वकर्मा उपस्थित रहे। नवनिर्माण संस्थान के संयोजक अरविंद कुमार आजन्स सहित कई गणमान्य लोग भी कार्यक्रम में शामिल हुए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे नवनिर्माण संस्थान के सचिव संजय कुमार ने कहा कि शहरों में बच्चों को खेल और कला के कई अवसर मिलते हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चे अक्सर इनसे वंचित रह जाते हैं। इसी उद्देश्य से यह प्रतियोगिता आयोजित की गई, ताकि ग्रामीण बच्चों को भी अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिल सके। उन्होंने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए आयोजन को निरंतर जारी रखने की बात कही।
पूरा माहौल उत्साह, उमंग और आनंद से भरा रहा। ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों में दिखा आत्मविश्वास यह संदेश दे गया कि प्रतिभा किसी स्थान की मोहताज नहीं होती।
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✨ कविता
गांव की मिट्टी में छिपा है उजास,
हर बच्चे में बसता है विश्वास।
मंच मिला तो हुनर चमक गया,
सपनों ने भी पंख पसार लिया खास।
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🌹 शायरी
कच्ची उम्र में जो हुनर को पहचान दे,
वही भविष्य को नई उड़ान दे।
ग्रामीण आंगन से निकले जो सितारे,
वो आसमान को भी हैरान कर जाएँ।
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📜 कबीरदास का उपदेश
“पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।”
अर्थ: केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं, बल्कि प्रेम, कला और संस्कार ही मनुष्य को सच्चा विद्वान बनाते हैं।

