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ख़ून का चाँद दुबई की फ़िज़ाओं में रूह को छू लेने वाला नज़ारासैय्यद आसिफ़ इमाम काक़वी



दुबई की जगमगाती सड़कों, आसमान छूती इमारतों और समंदर की ठंडी हवाओं में उस रात कुछ अलग ही था। जैसे ही अंधेरा गहराया, अचानक पूरी क़ायनात थम सी गई। आसमान पर वही चाँद जो हमेशा अपनी सफ़ेदी और नूर से दिलों को सुकून देता है, आज बिल्कुल अलग रूप में सामने था – लाल, रक्त से भीगा हुआ, दिल को कंपा देने वाला और आँखों को मोह लेने वाला। मैंने अपनी आँखों से इस Blood Moon को दुबई की फ़िज़ाओं में देखा। हज़ारों लोग, अलग-अलग मज़हब और क़ौम से जुड़े, सब एक साथ खड़े थे। कोई कैमरे में क़ैद कर रहा था, कोई दुआएँ माँग रहा था, तो कोई बस ख़ामोशी से आसमान की ओर देख रहा था। Blood Moon दरअसल एक पूर्ण चंद्रग्रहण होता है। जब पृथ्वी सूरज और चाँद के बीच आ जाती है तो सूरज की रोशनी सीधे चाँद तक नहीं पहुँच पाती। लेकिन पृथ्वी का वातावरण लाल रंग की किरणों को मोड़कर चाँद तक पहुँचाता है। इसी वजह से चाँद लाल, नारंगी या कभी-कभी गहरे रक्त के रंग का दिखाई देता है। यह केवल विज्ञान नहीं, बल्कि क़ुदरत के अद्भुत संतुलन की झलक है। तीनों  सूरज, धरती और चाँद – का एक सीध में आ जाना इंसान के लिए अल्लाह की निशानियों में से एक है।इतिहास गवाह है कि इंसान ने हमेशा रक्त चाँद को रहस्यमयी नज़र से देखा।
प्राचीन सभ्यताओं में इसे देवी-देवताओं का संदेश माना गया। कुछ समाजों में यह युद्ध और तबाही की निशानी समझा गया। मिस्र और बाबुल की कथाओं में इसे राजाओं के पतन और सत्ता परिवर्तन से जोड़ा गया। इस्लामी परंपरा में चंद्र और सूर्य ग्रहण को अल्लाह की निशानियाँ कहा गया, ताकि इंसान सबक़ ले और अपने रब को याद करे। पैग़म्बर-ए-इस्लाम ﷺ ने फ़रमाया कि सूरज और चाँद का ग्रहण किसी की मौत या पैदाइश से नहीं होता, बल्कि यह अल्लाह की निशानियाँ हैं ताकि इंसान इबरत हासिल करे।दुबई की ऊँची-ऊँची इमारतें मानो इस ख़ूबसूरत और डरावने नज़ारे के सामने झुक गई हों। बुर्ज ख़लीफ़ा की रोशनियाँ भी उस लाल चाँद के सामने फीकी लग रही थीं। लोग अपने घरों की बालकनियों, समंदर किनारे और रेगिस्तान की रेत पर खड़े होकर इस नज़ारे को देख रहे थे। वह लम्हा ऐसा था जैसे आसमान पर एक ख़ून से भरा आईना टाँग दिया गया हो और पूरी इंसानियत उसमें अपना चेहरा देख रही हो।चाँद को उस लाल रंग में देखकर दिल में अजीब सा डर भी था और मोहब्बत भी। डर इस बात का कि यह हमें हमारी छोटी-सी हैसियत याद दिला रहा है। मोहब्बत इस बात की कि यह नज़ारा इतना ख़ूबसूरत था कि निगाहें हट नहीं रही थीं। उस वक़्त दिल ने कहा  यह वही चाँद है जो आशिक़ों की रातों का साथी है, यह वही चाँद है जिसके लिए शायरों ने लाखों शेर कहे। आज यही चाँद हमें सबक़ दे रहा है कि ज़िंदगी रोशनी और अंधेरे का खेल है – कभी सुकून, कभी डर। और आख़िर में सब अल्लाह के हुक्म से है।शायरों और साहित्यकारों ने हमेशा चाँद को मोहब्बत, वफ़ा और हुस्न का प्रतीक माना। लेकिन जब यही चाँद लाल हो जाता है तो उसका असर भी जुदा हो जाता है।

किसी कवि ने लिखा:
“चाँदनी भी कभी ज़ख़्मों की तरह लगती है,
जब वो लालिमा में डूबकर दिल को दहला देती है।”

दुबई की उस रात में यही हाल था। लालिमा से भरा चाँद हर दिल के अंदर छुपे दर्द और डर को जैसे बाहर निकाल रहा था।यह दृश्य हमें बताता है कि इंसान चाहे कितनी भी ऊँचाई पर पहुँच जाए, क़ुदरत के सामने बस एक दर्शक है। हमारी इमारतें, हमारी दौलत, हमारी टेक्नोलॉजी सब बेमानी हैं जब क़ुदरत अपने करिश्मे दिखाती है। रक्त चंद्रमा हमें सिखाता है कि अंधेरे के बाद रोशनी ज़रूर आती है। डर के साथ ख़ूबसूरती भी जुड़ी होती है। क़ुदरत का हर मंज़र हमें सोचने और अपने अंदर झाँकने की दावत देता है।जब मैंने दुबई की फ़िज़ाओं में रक्त चंद्रमा को देखा, दिल ने कहा यह सिर्फ़ विज्ञान नहीं, बल्कि इबादत है। यह वो लम्हा है जब इंसान अपने रब को याद करता है, अपनी कमज़ोरी मानता है और अपने दिल की गहराइयों को महसूस करता है।

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