मगध के गांधी” सैयद फ़िदा हुसैन आज़ादी के परचम के सच्चे सिपाही………..

सैय्यद आसिफ इमाम काकवी
जहानाबाद की मिट्टी ने कई वीर सपूत पैदा किए, मगर जो नाम आज भी इतिहास के पन्नों पर सुनहरी इबारत की तरह चमक रहा है, वह है – ‘मगध के गांधी’ सैयद फ़िदा हुसैन। 1904 में पिंजौरा गांव में जन्मा यह नौजवान, अपनी मासूम आँखों में सिर्फ़ एक सपना बसाए बड़ा हुआ – गुलाम भारत को आज़ाद देखना। फ़िदा हुसैन ने असहयोग आंदोलन से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक हर मोर्चे पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। जेल की सलाखें, अंग्रेज़ी कोड़ों की मार, और भूख-प्यास की परीक्षाएँ – कुछ भी उनके हौसले को तोड़ न सकीं। गांधी जी, मौलाना आज़ाद, सुभाष चंद्र बोस, डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे महान नेताओं के साथ कदम से कदम मिलाकर उन्होंने मगध में आज़ादी की मशाल जलाई। महात्मा गांधी, स्वतंत्रता सेनानी बी अम्मा (आबादी बानो बेगम) के साथ पूरे भारत का दौरा कर रहे थे। इन लोगों का बिहार में आना हुआ। उस समय नौजवान फ़िदा हुसैन ने उनको भरपूर सहयोग दिया। 1920 में गया शहर में आयोजित हुए विभिन्न जलसों में हिस्सा लिया। उसी साल दिसम्बर में असहयोग तहरीक को कामयाब बनाने के लिए मौलाना शौकत अली, महात्मा गांधी, मौलाना आज़ाद, स्वामी सत्यदेव वग़ैरह के साथ गया और आसपास के इलाक़ों का दौरा किया। 1922 में देशबंधु चितरंजन दास की अध्यक्षता में गया में हुए कांग्रेस के 37वें अधिवेशन को कामयाब बनाने के लिए उन्होंने जी-जान लगा दिया। उनकी दिन रात की मेहनत की ख़ूब तारीफ़ भी हुई और मगध इलाक़े मे एक स्थापित कांग्रेसी युवा नेता के रूप में उन्हे जनमानस में ख्याति मिली। उन्होंने महात्मा गांधी के सामने ही खादी वस्त्र धारण किया और उसका आजीवन पालन भी किया। 1928 में फ़िदा हुसैन ने साइमन कमीशन का विरोध करते हुए अपने साथियों के साथ एक विशाल जुलूस निकाला। फिर उन्हीं के साथ बिहार की राजधानी पटना में सैयद हसन ईमाम की सदारत में हो रहे साइमन कमीशन विरोधी आयोजन में खुलकर हिस्सा लिया और अपनी मज़बूत उपस्तिथि दर्ज करवाई। 19 दिसम्बर 1929 को जवाहर लाल नेहरू की सदारत में हुए लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में पूर्ण स्वराज की मांग करते हुए 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस मनाने का फ़ैसला किया गया। तब भला फ़िदा हुसैन कैसे ख़ामोश बैठने वाले थे! 26 जनवरी 1930 को उन्होंने बड़े ही धूमधाम से स्वतंत्रता दिवस का आयोजन किया। इसी साल 1930 में गांधी की क़यादत में नमक सत्याग्रह छिड़ा और दांडी मार्च हुआ। फ़िदा हुसैन ने भी इसमें अपने तरीक़े से हिस्सा लिया और विदेशी सामान की होली जलाई 23 मार्च 1931 को लाहौर सेन्ट्रल जेल में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को दी गई फांसी की गर्माहट बिहार सहित पूरे देश ने महसूस की और इसका असर फ़िदा हुसैन पर भी पड़ा, नतीजतन वो उग्र राष्ट्रीयता की ओर अग्रसर हुए। फांसी के विरोध में फ़िदा हुसैन की क़यादत में पूरे मगध मे विरोध सभाओं का आयोजन हुआ। इसी क्रम में 30 और 31 मई 1931 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद की सदारत में जहानाबाद अनुमंडल (अब ज़िला) में राजनीतिक सम्मेलन हुआ। इसमें फ़िदा हुसैन ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और उनकी सेवा भावना ने सभी का दिल जीत लिया। स्वंय डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने उनकी तारीफ़ की।इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना के स्वर्ण जयंती समारोह में डॉ राजेंद्र प्रसाद की सरपरस्ती में 28-30 दिसम्बर 1935 को जहानाबाद में प्रभातफेरी, खादी प्रर्दशनी, कांग्रेस की उपलब्धियों पर व्याख्यान, शहीदों की क़ुर्बानियां जैसे कई मुद्दों पर अनेक कार्यक्रमों के आयोजन में अहम भूमिका निभाई। 1938 में कांग्रेस के सदर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के मगध दौरे को कामयाब बनाने में फ़िदा हुसैन आगे आगे रहे। 1940 में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की अध्यक्षता में हुए कांग्रेस के 53वें अधिवेशन में फ़िदा हुसैन ने ना सिर्फ़ हिस्सा लिया बल्कि कई महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए। अगस्त क्रांति को कामयाब बनाने में भी उन्होंने कोई क़सर नहीं छोड़ी। 8 अगस्त 1942 को गांधी जी की क़यादत में जैसे ही युसुफ़ जाफ़र मेहर अली ने ‘अंग्रेज़ो भारत छोड़ो’ का नारा दिया पूरे भारत मे इंक़लाबी लहर दौड़ पड़ी; फ़िदा हुसैन ने भी अपने साथियों के साथ मिलकर पूरे मगध इलाक़े में इस आंदोलन में जान डाल दी। सरकारी दफ़्तर पर क़ब्ज़ा कर लिया हथियार लूट कर पुलिस स्टेशन को आग के हवाले कर दिया। अरवल, कुर्था आदि जगहों पर आंदोलन काफ़ी हिंसक रहा। इस दौरान फ़िदा हुसैन के कई क्रांतिकारी साथी पुलिस की गोली का शिकार भी हुए। फ़िदा हुसैन को गिरफ़्तार कर भागलपुर सेंट्रल जेल भेज दिया गया।1947 में दंगा पीड़ितों का हालचाल लेने गांधी फिर मगध इलाक़े में आए तब फ़िदा हुसैन ने उनके साथ पूरे इलाक़े का दौरा किया। उनकी कलम भी उतनी ही तेज़ थी जितनी उनकी आवाज़। अपनी क्रांतिकारी पत्रिका ‘चिंगारी’ के ज़रिए उन्होंने अंग्रेज़ी हुकूमत की पोल खोली और जनता में बग़ावत की चिंगारी भड़काई। किसान आंदोलनों में उनकी भूमिका और मज़लूमों की आवाज़ बनने का जज़्बा, उन्हें जनता के दिलों में अमर कर गया। आज़ादी के बाद भी उन्होंने राजनीति को सेवा का माध्यम बनाया, दो बार जहानाबाद के विधायक भी बने, और आख़िरी सांस तक अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। 31 दिसंबर 1980 को जब उनका इंतक़ाल हुआ, तो मगध ही नहीं, पूरा बिहार एक सच्चे, ईमानदार और बेबाक सिपाही को खोने के ग़म में डूब गया। और इसके साथ ही मगध में गांधी युग के मज़बूत स्तंभ का अंत हो गया। मगध के गांधी’ के नाम से मशहूर सैयद फ़िदा हुसैन हमेशा अवसरवाद, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता और पूंजीवाद से लड़ते रहे। अपनी ईमानदारी, सरलता आदर्शवादिता जैसे मानवीय गुणों की वजह से सैयद फ़िदा हुसैन हमेशा याद किए जाएंगे। आज, जब हम भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता और अवसरवाद की आंधियों से जूझ रहे हैं, तब फ़िदा हुसैन की ईमानदारी, त्याग और संघर्ष हमें याद दिलाते हैं कि सच्चा नेता वह है जो अपने लोगों के लिए जीए और उनके लिए ही मरे।

