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विद्यार्थी परिषद बिहार इकाई के संस्थापक प्रोफेसर डॉ.रविंद्र प्रसाद केसरी जी की संक्षिप्त जीवनी प्रस्तुत कर रही हूॅ



प्रियम्बदा कुमारी केसरी (पूर्व प्रदेश मंत्री भाजपा) के कलम से——-


  पटना 



संक्षिप्त जीवनी- मेरे ताऊजी स्वर्गीय प्रोफेसर रविंद्र प्रसाद केसरी जी की

स्वर्गीय डॉक्टर प्रोफेसर रविंद्र प्रसाद केसरी जी का जन्म मुंगेर जिला के हवेली खड़कपुर में एक संभ्रांत  परिवार में 22 /12 /1932 को हुआ था।बाल्य काल से ही देश की सेवा की भावना उनके अंदर कूट-कूट कर भरी हुई थी ।1942 में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए थे और वह नियमित रूप से शाखा और संघ की बैठकों में भाग लेने लगे। 1965 में जब जनसंघ का सदस्यता अभियान चल रहा था, बिहार के मुंगेर जिले में उन दिनों गिने-चुने संघ कार्यकर्ता हुआ करते थे। कांग्रेस पार्टी का बोलबाला था किंतु, उस विषम परिस्थितियों में भी प्रोफेसर रविंद्र प्रसाद केसरी जी ने बहुत ही कठिन परिश्रम और लगन से सदस्यता अभियान को सफल बनाया और मुंगेर जिला में सामान्य जनमानस को पहली बार जंनसघ पार्टी की विचारधारा से अवगत कराया और फिर धीरे-धीरे लोग जंनसघ के विचारधारा से प्रभावित होकर सदस्य बनने में रुचि लेने लगे। 1967 में श्री केसरी जी ने माननीय अटल बिहारी वाजपेई जी के भाषण का कार्यक्रम अपने गृह क्षेत्र मुंगेर जिला के हवेली खड़कपुर में काली मंदिर के प्रांगण में लिया। अटल जी के ओजस्वी भाषण ने हर लोगों का मन जीत लिया था। केसरी जी की शैक्षणिक योग्यता ( एम.एस.सी) एवं पीएचडी Botany की थी। (1959) में पटना साइंस कॉलेज में नौकरी ज्वाइन किए थे और सेवानिवृत्ति पटना साइंस कॉलेज से ही प्रोफेसर पद से हुए थे। सन 1972 में साइंस कॉलेज में रहते हुए उन्हें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद बिहार इकाई का गठन करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। उन्हें बिहार के प्रथम पूर्णकालिक स्वयंसेवक कहलाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था और आजीवन अविवाहित रहकर देश की सेवा करते रहे। सन 1972 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (बिहार प्रदेश) के प्रथम संगठन मंत्री की जिम्मेदारी दी गई। 18 मार्च 1974 से बिहार में छात्रों का प्रदर्शन और आंदोलन आरंभ हो गया था। उस आंदोलन का नेतृत्व भले ही जयप्रकाश नारायण जी कर रहे हो किंतु, आंदोलन की सारी शक्ति का केंद्र अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद बिहार इकाई के इर्द-गिर्द ही था। और विद्यार्थी परिषद के संगठन को मजबूत बनाने में स्वर्गीय प्रोफेसर रविंद्र प्रसाद केसरी जी का योगदान अद्वितीय, अविस्मरणीय और अकल्पनीय रहा। प्रतिस्पर्धा, धोखेबाजी और  व्यवसायिकता उनके जीवन प्रयत्न छू नहीं सकी। उन्होंने तन, मन और अपने जीवन में अर्जित किए हुए संपूर्ण धन से  बिहार में छात्रों का मजबूत संगठन खड़ा किया। वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष माननीय जगत प्रसाद नड्डा जी के पिता नारायण लाल नड्डा जी भी केसरी जी के मित्र थे। (1977) में जे.पी नड्डा जी  ने अपने कॉलेज में छात्र संघ का चुनाव लड़ा था तो प्रोफेसर रविंद्र प्रसाद केसरी जी के साथ उन्हें काम करने का शुभ अवसर प्राप्त हुआ था(1975) में इमरजेंसी के दौरान उन्होंने अंडरग्राउंड कर्मी के रूप में बहुत ही सतर्कता पूर्वक अपने संगठन के कार्य को संपन्न करते रहे। इस बीच उन्हें नौकरी से निलंबित भी किया गया। उन्हें गिरफ्तार करके उन्हें उनके ऊपर (डी .आई .आर) के अधीन केस किया गया 1977 के चुनाव की घोषणा के कुछ दिन पहले उन्हें न्यायालय से जमानत मिली और निलंबन समाप्त हुआ था। पुण: केसरी जी साइंस कॉलेज में अपनी सेवा दिए और लाखों गरीब असहाय बच्चों को निस्वार्थ भाव से शिक्षित करने का काम किया। प्रोफेसर पद को सुशोभित करते हुए भी उन्होंने कभी साइंस कॉलेज के प्रोफेसर क्वार्टर में रहने की इच्छा जाहिर नहीं की । पवित्र गंगा मैया के अभूतपूर्व प्रेम और सादगी भरी जिंदगी के कारण गंगा किनारे रानी घाट में देवी बाबू के मकान के एक छोटे से कमरे में अपने संपूर्ण जीवन को व्यतीत किया। जिस वक्त परम आदरणीय सरसंघ चालक मोहन भागवत जी बिहार के प्रचारक हुआ करते थे, उस समय प्रोफेसर रविंद्र प्रसाद केसरी जी प्रोफेसर देवी बाबू के गंगा किनारे वाले मकान में ही रहते थे मोहन भागवत जी अक्सर यहां आकर रहा करते थे । (1998 )में जब अटल बिहारी वाजपेई जी देश के प्रधानमंत्री बने थे तो केसरी जी इस खुशी के उपलक्ष में विद्यार्थी परिषद, आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ विशाल संयुक्त भोज पार्टी का आयोजन किया था।जिसमें विद्यार्थी परिषद, संघ और भारतीय जनता पार्टी के सभी माननीय और कार्यकर्ता गण उपस्थित थे।उस समय के तत्काल राष्ट्रीय महामंत्री आदरणीय गोविंदाचार्य जी भी उस कार्यक्रम में उपस्थित रहे,मैं भी उस कार्यक्रम की गवाह रही । उस कार्यक्रम के कुछ फोटोग्राफ अभी भी मैं सहेज कर रखी हुई हूं। साइंस कॉलेज से अवकाश प्राप्त करने के करीब 2 वर्षो उपरांत 5 फरवरी 2003 को उनका देहांत हो गया । और केसरी जी गोलोक प्रस्थान कर गए किंतु, उन्होंने अपने संत और संन्यासी होने का प्रमाण हम सबों के बीच छोड़ ही गए।
परिवार के द्वारा चिता पर अंतिम संस्कार की तैयारी के दौरान मुखाग्नि के पूर्व ही चिता में खुद व खुद अग्नि प्रज्वलित हो उठी ।जो हम सभी परिवारों के लिए एक अविस्मरणीय घटना थी ।शरीर से भले ही उनकी मृत्यु हो गई हो किंतु, शाश्वत संदेश विद्यार्थी परिषद , संघ और भारतीय जनता पार्टी को युगों- युगों तक अलौकिक करता रहेगा।

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