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कंधे पर कांवर: ओठों पर बोल बम


   मनभावन पावन सावन का महीना, प्रकृति हरी चूनर पहन इठलाने लगती है तो भक्तों के कंधे पर कांवर, उसमें गंगा जल और ओठों से गूंजते बोल बम की ध्वनि वातावरण को शिव भक्ति में सराबोर कर देती है। व्यक्तिगत पहचान, नाम सब भूलकर संबोधन होता है – बम। हर कांवरिया बम के नाम से संबोधित होता है।ऐसा लोक विश्वास है कि अवढरदानी महादेव कांवर लेकर उनका अभिषेक करने से वे अति शीघ्र खुश हो भक्तों की मनोकामना पूरी करते हैं।
कांवर यात्रा पर निकलने के पहले भक्त तन-मन विचार से पवित्र होते हैं और जलाभिषेक करने के समय तक पूरी दृढ़ता से इसका पालन किया जाता है। यात्रा में भारत की सांस्कृतिक संपन्नता भी दृष्टिगोचर होती है। विभिन्न जगहों के श्रद्धालु अपनी स्थानीय बोली, भाषा में भगवान शिव से संबंधित गीत, भजन, गाते रहते हैं।सबकी एक ही आकांक्षा होती है – तीन लोक में बस्ती बसाने और खुद वीराने में रहने वाले नीलकंठ को प्रसन्न करना।
  कांवर यात्रा की शुरुआत कब हुई, कहना कठिन है।यह परंपरा ही नहीं, भक्ति,श्रद्धा का प्रतीक और अहंकार का विसर्जन भी है।वैसे श्रवण कुमार की अंधे माता-पिता को कांवर में लेकर तीर्थ यात्रा प्रसिद्ध है तो कुछ विद्वानों के अनुसार प्रभु श्री राम ने भी पिता दशरथ के मोक्ष के लिए कांवर उठाया था। एक मान्यता के अनुसार भगवान परशुराम सबसे पहले गढ़ मुक्तेश्वर से गंगाजल लेकर बागपत स्थित पुरा महादेव में शिव का अभिषेक करने पहुंचे थे। एक पौराणिक मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन के बाद सृष्टि की रक्षा के लिए भयंकर विष का पान किया। उसका ताप शांत करने के लिए पवित्र नदियों का जल उन पर चढ़ाया था,उसी समय से कांवर यात्रा की शुरुआत हुई।
   साक्षी पाठक, बिहटा, पटना।

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