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हाथ लिए बेलपत्र के दउरा


     ‘हाथ लिए बेलपत्र के दउरा, महादेव पूजन जाली गउरा’  भगवान शिव को जल चढ़ाने जाती महिलाओं के कल कंठों से गूंजते इस गीत से मन में एक सवाल उठ खड़ा हुआ। बेलपत्र के बिना भगवान शिव की पूजा की कल्पना भी क्यों नहीं की जा सकती? यह उन्हें इतना प्रिय क्यों है?
  पौराणिक मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय अमूल्य वस्तुओं के साथ कालकूट (जहर) भी निकला।इस विष के असर से संपूर्ण ब्रह्मांड के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा। ऐसे में रक्षा के लिए भगवान शिव ने कालकूट का पान तो कर लिया किन्तु उसके ताप से उनका शरीर जलने लगा। ऐसे में उनकी शीतलता के लिए उन्हें बेलपत्र चढ़ाये गये। इससे उनका ताप और जलन कम हुई,उसी समय से यह उन्हें अत्यंत प्रिय हो गया। दूसरी कथा के अनुसार माता पार्वती ने शिव को प्रसन्न करने के लिए कठिन तप करते हुए उन्हें बेलपत्र भी चढ़ाये थे।
स्कंद पुराण के अनुसार मंदरांचल  पर माता पार्वती के पसीने की कुछ बूंदें गिरी थीं जिससे बिल्व (बेल) वृक्ष उग आया। इससे ऐसी मान्यता है कि इसमें माता पार्वती के सभी रुप मौजूद हैं। जड़ में गिरिजा, तनों में माहेश्वरी, शाखाओं में दक्षिणायनी तथा पत्तियों में पार्वती स्वरूप में विद्यमान हैं। धार्मिक दृष्टिकोण से यह माना जाता है कि बेलपत्र सत्व,तमस तथा रजस- तीनों गुणों का परित्याग करके अहंकार शून्य होकर आत्मा से परमात्मा की यात्रा का प्रतीक है।
  *खुशी मिश्रा, भरौली, भोजपुर*।

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