मेरे 47 वें वैवाहिक वर्षगांठ (22 जून )के अवसर पर रसिक मित्रों ने कुछ प्रेम और शृंगार के गीत /ग़ज़ल सृजित किए हैं |


मेरे 47 वें वैवाहिक वर्षगांठ (22 जून )के अवसर पर रसिक मित्रों ने कुछ प्रेम और शृंगार के गीत /ग़ज़ल सृजित किए हैं |
उनकी 2-2 रचनाएं रोज़ प्रस्तुत करने का इरादा है |
इस शृंखला में आज डॉ सीमा विजयवर्गीय,अलवर राजस्थान और बाबा बैद्यनाथ झा,पूर्णिया,बिहार की रचनाएं साभार प्रस्तुत हैं |
मित्रगण आनन्द उठायें –
मुरस्सा ग़ज़ल – डॉ सीमा विजयवर्गीय, अलवर, राजस्थान
बसा हुआ नैनों में वो ही, रग-रग में उसकी ही छाया
साँसों में ख़ुशबू भी उसकी, इस दिल को बस वो ही भाया
शब्दों की भाषा में मुझको, उसने कुछ भी नहीं जताया
फिर भी हरदम साथ रहा वो, दिल का रिश्ता ख़ूब निभाया
कितनी बार हुआ है ऐसा, कितनी बार सजे हैं वो पल
उसने मुझमें ख़ुद को ढूँढा, मैंने उसमें ख़ुद को पाया
चुप्पी में भी जाने कैसे, पढ़ लेता अन्तस की बातें
दुख में भी ख़ुश होकर जीना, उसने ही मुझको सिखलाया
डूबी रहती उसमें हर पल, हँसती-खिलती साथ उसी के
अपनी हर सरगम में मैंने, उसको ही, उसको ही गाया
सूरज-चाँद-सितारों में वो, दिख जाता तब ये लगता है
मेरी सूरत उसकी जैसी, वो भी है मेरा ही साया
डा सीमा विजयवर्गीय
गीत – बाबा बैद्यनाथ झा, पूर्णिया, बिहार
“रिमझिम इस बरसात में”
आधार- “प्रदीप छन्द=16–13 का मात्राक्रम”
करें नहीं हम व्यर्थ समय को,इधर-उधर की बात में।
मिलकर हम आनन्द मनाएँ,रिमझिम इस बरसात में।।
प्रियतम को लेकर उपवन में,जाकर थोड़ा घूम लें।
फिर उमंग के पंख सहारे, नभ को छूकर चूम लें।।
चाँद सितारों का भी उसमें,उत्सव कहकर साथ लें।
कजरी गाकर नृत्य करें फिर,हाथों में भी हाथ लें।।
तब स्वर्गिक आनन्द मिलेगा,उस अनुपम सौगात में।
मिलकर हम आनन्द मनाएँ,रिमझिम इस बरसात में।।
सांसारिक उलझन में पड़कर,त्यागें मत आनन्द हम।
काव्य सहोदर की सन्निधि में,पाएँ परमानन्द हम।।
पावस काल हमें देता है,आवश्यक कुछ ज्ञान भी।
मानव तन पाकर हम भी दें,जग को कुछ अवदान भी।।
मत उलझाएँ अपने मन को,भौतिक झंझावात में।
मिलकर हम आनन्द मनाएँ,रिमझिम इस बरसात में।।
सावन में लिखता है “बाबा’,सदा गीत शृंगार का।
विरहानल का वर्णन होता,पुनः मधुर अभिसार का।।
अभिधा और लक्षणा में भी,बन जाते हैं गीत जब।
व्यंजित अर्थ हृदय को छूता,खुश होते मनमीत तब।।
उद्दीपन होता है मन में,सिहरन होती गात में।
मिलकर हम आनन्द मनाएँ,रिमझिम इस बरसात में।।
शुक्रिया