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हसनैन मंज़िल, गया: एक विरासत, एक रौनक, एक इतिहास

हसनैन मंज़िल, गया: एक विरासत, एक रौनक, एक इतिहास

लेखक: सैय्यद आसिफ इमाम काकवी & अज़ाज़ सुल्तान  ख़ास रिपोर्ट गया और  दुबई से


गया की ऐतिहासिक धरती पर, मुरारपुर मोहल्ले में स्थित हसनैन मंज़िल एक ऐसी इमारत है जो समय की गर्द में भी अपनी रौनक और रूहानी चमक को संजोए हुए है। लगभग 112 वर्षों से यह भवन न केवल एक पारिवारिक आशियाना रहा है, बल्कि बिहार की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक धरोहर का भी गवाह रहा है। आज भी जब कोई मुरारपुर की गलियों से गुजरता है, तो हसनैन मंज़िल की मौजूदगी इतिहास की एक जीवंत दस्तावेज जैसी लगती है। यह वही घर है जहां आज वॉरिस हैदर भाई अपने परिवार के साथ आबाद हैं। वे हमारे सगे सदू सैयद ज़ुल्फ़िकार हैदर साहब के चचाज़ाद भाई हैं। इस घर की चारदीवारी के भीतर आज भी वही गर्मजोशी, वह तहज़ीब, वह मोहब्बत महसूस होती है जो किसी दौर में बड़े-बुजुर्गों के वक़्त की खास पहचान थी। इस इमारत से कई मशहूर और अज़ीम शख्सियतों का वास्ता रहा है। यहां ज़फ़र नवाब साहब और उनके वालिद मीर अबू सालेह साहब का नाम ख़ास तौर पर लिया जाता है। मीर अबू सालेह साहब, गया की सियासी और सामाजिक ज़िंदगी में एक बड़ा नाम रहे हैं। आज गया शहर में उनके नाम पर एक सड़क भी है  “Meer Abu Saleh Road” – जो उनके योगदान का जीता-जागता सबूत है। हसनैन मंज़िल का नाम भारतीय संविधान के इतिहास में भी सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। हुसैन इमाम साहब – जो इसी खानदान से ताल्लुक रखते थे।  भारत के संविधान सभा के सदस्य थे। जब 26 नवम्बर 1949 को संविधान पर  284  लोगों ने दस्तख़त किए, तो उन पर हुसैन इमाम साहब के भी हस्ताक्षर हैं। आज भी भारतीय संसद भवन (Parliament House) में जाकर संविधान की मूल प्रति में उनका नाम और हस्ताक्षर देखा जा सकता है। उनका योगदान न केवल बिहार बल्कि पूरे देश की लोकतांत्रिक संरचना की नींव में शामिल रहा है। वे कांग्रेस के प्रभावशाली नेता रहे, और कई महत्वपूर्ण विधायी चर्चाओं में उनकी भूमिका निर्णायक रही। गया (बिहार) की मशहूर और ऐतिहासिक हसनैन मंज़िल  सिर्फ़ एक पुरानी इमारत नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक, सामाजिक और सियासी विरासत की गवाह रही है। इस घराने से ना सिर्फ़ अदब और इल्म के रौशन चिराग़ जले, बल्कि सियासत में भी अहम किरदार निभाने वाले रहनुमा निकले। इसी घराने के फ़रज़ंद, मरहूम सैयद अली हैदर साहब जो कि जनाब सैयद ज़ुल्फ़िकार हैदर और वारिस हैदर भाई  के चचा थे जनाब सैयद अली हैदर  साहब तीन भाइयों में सबसे बड़े थे। उनके दूसरे नंबर के भाई थे जनाब सैयद रज़ी हैदर साहब, जो प्रशासनिक सेवा में थे और एसडीएम (अपर जिलाधिकारी) के पद पर कार्यरत रहे। सैयद रज़ी हैदर साहब के साहबजादे का नाम सैयद ज़ुल्फ़िकार हैदर है। तीसरे और सबसे छोटे भाई थे जनाब सैयद ज़की हैदर साहब, जिनके साहबज़ादे सैयद वारिस हैदर हैं। जनाब सैयद अली हैदर साहब के अपने परिवार में चार साहबज़ादियाँ (बेटियाँ) हैं और एक साहबज़ादा (बेटा) हैं  सैयद अब्बास हैदर साहब, जो पटना हाईकोर्ट में अधिवक्ता के रूप में कार्यरत हैं। इसी घराने के फ़रज़ंद, मरहूम सैयद अली हैदर साहब  बिहार की राजनीति में एक अहम नाम रहे। वे 1979 में जनता पार्टी की सरकार में सहकारिता मंत्री (Cooperative Minister) के ओहदे पर रहे और MLC (सदस्य विधान परिषद) भी चुने गए। उनकी सियासत का सफ़र निष्ठा, ईमानदारी और अवाम की खिदमत से जुड़ा हुआ था। वे अपने दौर के उन चंद सियासतदानों में थे जो जमीनी हकीकत से वाक़िफ़, और जनता के दर्द से वाबस्ता थे। उनकी ख़िदमत और सादगी आज भी लोगों के जेहन में जिंदा है। आज भी जब मुरारपुर में हसनैन मंज़िल का ज़िक्र होता है, तो वहां की दीवारें सैयद अली हैदर साहब की सेवा, उनके सियासी व तालीमी सोच, और उनके नेक मिज़ाज की गवाही देती हैं। यह घर आज भी जनाब सैयद वारिस हैदर साहब और उनके ख़ानदान की मौजूदगी में उसी मोहब्बत और तहज़ीब से आबाद है। ऐसे दौर में जब हम अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं, हसनैन मंज़िल जैसे मकान हमें हमारे इतिहास, हमारी पहचान और हमारी जिम्मेदारी की याद दिलाते हैं। यह लेख सिर्फ़ एक इमारत की तारीफ नहीं, बल्कि उस पूरे परिवार और विरासत को सलाम है जिन्होंने बिहार और देश के सामाजिक-राजनीतिक इतिहास में अपना नाम अमर कर दिया।

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