अहया भोजपुरी: उर्दू शायरी की बेबाक आवाज़, पटना की सरज़मीन से उठी एक रौशनी

✍️ सैय्यद आसिफ इमाम काकवी, दुबई से
आज उर्दू शायरी की दुनिया के उन चमकते सितारों में से एक जनाब अहया भोजपुरी साहब का यौमे पैदाइश है। एक ऐसा नाम जिनकी पहचान के लिए किसी तआर्रुफ़ की जरूरत नहीं। वह पेशे से इंजीनियर हैं, लेकिन दिल से शायर हैं और यही शौक़ उन्हें इस अदबी आसमान में बुलंदियों तक ले गया। अज़ीमाबाद (पटना) जो इल्म, अदब और तहज़ीब का मर्कज़ रहा है, वहां से पैदा हुई इस शख्सियत ने उर्दू शायरी को एक नई रवानी दी। अहया भाई तीन वर्षों से पटना में कामयाब मुशायरों की महफ़िल सजा रहे हैं, और हर बार ऐसा लगता है जैसे उर्दू ज़बान फिर से अपनी शानो-शौकत को लौट रही हो। उनकी शायरी महज़ अल्फ़ाज़ का जादू नहीं, बल्कि समाज और सियासत की गहराइयों में उतरती सोच का आईना है। उनके शेर रिश्तों की पेचीदगियों से लेकर, ज़माने की सच्चाइयों तक हर मोर्चे पर इंसान को झकझोरते हैं।
“मेरा घर जलाने वाले, मुझे फिक्र है तेरी भी
के हवा का रुख जो बदला, तेरा घर भी जल न जाए…”
यह सिर्फ़ शेर नहीं, ज़माने की चाल को पढ़ने की सलाहियत है। अहया भोजपुरी साहब की शख्सियत जितनी पुरअसर, उतनी ही सादगी से भरी हुई है। वह न सिर्फ़ बुज़ुर्गों की अज़मत को सलाम करते हैं, बल्कि नौजवानों से ऐसी मुहब्बत करते हैं जो प्रेरणा बन जाए। उनकी किताब “उम्मीद-ए-नौ” का हर पन्ना ज़माने से उम्मीद, इंकलाब और इख़लास का पैग़ाम देता है। शायरी में उनके लहजे की बेबाकी, उनकी नज़्मों की गहराई, और ग़ज़लों की सच्चाई उर्दू अदब की तारीख़ में उनका नाम मुकम्मल करती है।
“किसी की आंख में चुभता हूं मैं कहीं न कहीं
इसी लिए तो निशाने पे बार-बार हूं मैं…”
जनाब अहया साहब न सिर्फ़ एक बेहतरीन शायर हैं, बल्कि दुबई में उर्दू अदब को फ़रोग़ देने वाली संस्था “नविश्ता-ए-दुबई” के सक्रिय सचिव भी हैं। 22 वर्षों से दुबई में रहकर उन्होंने भारत और ख़ासकर बिहार के साहित्यिक माहौल को जोड़ने का काम किया है। नविश्ता” न सिर्फ़ अंतरराष्ट्रीय मुशायरे आयोजित करता है, बल्कि प्रेम, तहज़ीब और भाईचारे के अदबी पुल भी तैयार करता है। पिछले वर्ष पटना में नविश्ता द्वारा आयोजित मुशायरा अदबी हल्क़ों में चर्चा का विषय रहा। अहया भोजपुरी साहब ने जो मुकाम हासिल किया है, वो बहुत कम लोगों को नसीब होता है — और इसकी वजह है उनकी मेहनत, ईमानदारी और उस ज़बान से मोहब्बत जो उनके दिल में रच-बस गई है। उनकी शायरी में हमें एक ऐसा इंसान नज़र आता है जो ज़माने से लड़ भी सकता है, और मुहब्बत की मशाल भी थामे हुए है। ख़ुदा जनाब अहया भोजपुरी साहब को सेहत, तवील उम्र और कामयाबी अता करे। उनकी शायरी उर्दू अदब की मीरास को और रौशन करे। आज का दिन सिर्फ़ उनकी सालगिरह नहीं, उर्दू अदब के लिए एक जश्न का दिन है।