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मरियम फ़ज़ल की उड़ान: गया की बेटी ने कामयाबी से सजाया अपने अब्बा का नाम, रौशन किया पूरा ख़ानदान”



लेखक: सैय्यद आसिफ इमाम काकवी

जब ख़्वाब मेहनत से टकराते हैं, तो तक़दीरें बदलती हैं। और जब तालीम को अपना हथियार बनाया जाए, तो एक बच्ची पूरे क़ौम की उम्मीद बन जाती है। गया (बिहार) की होनहार छात्रा मरियम फ़ज़ल ने यही कर दिखाया। CBSE 12वीं बोर्ड परीक्षा में 92% अंक प्राप्त कर उन्होंने न सिर्फ़ अपने ख़ानदान का सिर ऊँचा किया, बल्कि शिक्षा के मैदान में मुस्लिम बेटियों की बुलंद हिम्मत की एक नई मिसाल भी पेश की।
मरियम फ़ज़ल कोई आम नाम नहीं, बल्कि एक इंकलाब की दस्तक है। मरहूम इंजीनियर सैयद फ़ज़ल-उल-हक़ की यह प्यारी बेटी और सैयद अज़ाज़ सुल्तान व एहसान तबिश साहब की भांजी, आज हर उस बेटी की आवाज़ बन गई हैं, जो हालात से लड़कर तालीम को ज़िंदगी की पहली सीढ़ी बनाना चाहती है।

उनकी इस कामयाबी पर बहन ज़ारा फ़ज़ल, भाई ज़ोहेब फ़ज़ल और मां ज़ीनत सुल्ताना की आंखें आंसुओं से भीगी हैं, मगर वो आंसू खुशी और फख्र के हैं। घर के तमाम बुज़ुर्ग—चाचा, चाची, खाला, खालू, फूफा, फूफी, दादी, मामा, मामी—सबकी दुआओं ने जैसे आसमान को छू लिया हो।

गया शहर के अज़ीज़ लोग, स्कूल के शिक्षक और साथ पढ़ने वाले छात्र-छात्राएं भी मरियम को तहे दिल से मुबारकबाद दे रहे हैं। यह कामयाबी केवल एक छात्रा की निजी जीत नहीं है, यह पूरे समाज के लिए रौशनी की किरण है।

मरियम की सफलता उन तमाम मुस्लिम बच्चों के लिए पैग़ाम है जो अक्सर संसाधनों की कमी और सामाजिक पूर्वाग्रहों के कारण पीछे रह जाते हैं। उन्होंने दिखा दिया कि किताबों से मोहब्बत करने वाले हाथ, कल क़लम से दुनिया बदल सकते हैं।

“तालीम वह रोशनी है जो सिर्फ़ कमरा नहीं, नस्लों को रौशन करती है।
हम अल्लाह से दुआ करते हैं कि मरियम फ़ज़ल की तरह हर बच्चा, हर बच्ची कामयाबी की बुलंदियों को छूए।
अल्लाह मरियम को और बुलंदियां अता करे, उनका मुस्तक़बिल रौशन करे, और मुस्लिम समाज को तालीम की ताक़त से मज़बूत बनाए।

सुम्मा आमीन।

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