माननीय राज्यपाल के पांव छू लिए……..



23 अप्रैल, 2025 को वीर कुंवर सिंह विजयोत्सव के दिन माननीय राज्यपाल श्री आरिफ मोहम्मद खां भोजपुर जिला के तरारी प्रखंड में आये थे। वीर कुंवर सिंह की प्रतिमा पर माल्यार्पण के पश्चात एक निजी अस्पताल के उद्घाटन समारोह में उनसे मेरी मुलाकात हुई। वहां औरंगाबाद के पूर्व सांसद श्री सुशील कुमार सिंह एवं विधान पार्षद श्री जीवन कुमार भी थे। विधान पार्षद श्री जीवन जी ने माननीय राज्यपाल से मेरे सेवा क्षेत्र, प्रधानमंत्री द्वारा ‘मन की बात‘ में मेरे कार्यों की चर्चा एवं भारत सरकार द्वारा ‘पद्म श्री‘ सम्मान की घोषणा के संबंध में बताया। उन्होंने बधाई देते हुए कहा-“पटना आईए और बताइए कि इस अभियान में मैं आपकी क्या और कैसे मदद कर सकता हूं?
मैं अपने छोटे पुत्र मनीष वत्स के साथ राजभवन, पटना गया। वहां पीआरओ श्री धीरज नारायण सुधांशु से मुलाकात हुई। वे लगभग डेढ दशक पहले आरा में डीपीआरओ थे। श्री सुधांशु बड़े मृदुभाषी, व्यवहार कुशल और कार्य के प्रति निष्ठावान हैं। उन्होंने चाय पिलाने के साथ ही माननीय राज्यपाल महोदय की संवेदनशीलता, बेहतर कार्यप्रणाली और मिलनसारिता आदि की तारीफ किया, जिसकी चर्चा पिछले कई माह से सुन रहा था। मुझे तरारी के कार्यक्रम में भी ऐसा एहसास हुआ था। पहलगाम की घटना के फलस्वरूप ‘राष्ट्र व्यापी शोक‘ को लेकर उन्होंने सम्मान समारोह स्थगित करा दिया था। कार्यक्रम में शामिल कई राष्ट्रीय स्तर के कलाकारों की मौजूदगी देख संचालक को स्पष्ट निदेश दिये कि कोई साज-बाज, गीत-संगीत नहीं होगा। बाबू कुंवर सिंह की मूर्ति पर माल्यार्पण तथा अतिथियों का वक्तव्य के अतिरिक्त सारे कार्यक्रम स्थगित कर दिये गये। उन्होंने अपने संबोधन में स्वास्थ्य को लेकर शास्त्र सम्मत कई सूत्र बताते हुए कहा कि परिवार, समाज और देश की सेवा तभी संभव है, जब शरीर स्वस्थ हो। खैर!
निर्धारित समय पर माननीय राज्यपाल महोदय से मिलना हुआ। उन्होंने कुछ देर तक मुसहर जाति के संदर्भ में बड़ी उत्सुकता से मेरी बातें सुनी। उनकी आर्थिक, सामाजिक एवं शैक्षणिक स्थिति पर अफसोस जताते हुए कई सवाल किये। फिर उन्होंने पूछा “आप उसी कम्युनिटी से आते हैं?” “जी नहीं, मैं राजपूत हूं।” उन्होंने अपना दाहिना पंजा हिलाते हुए कहा “नहीं, नहीं…….। मैं सिर्फ ये जानना चाहता था कि आप उस कम्युनिटी से हैं या दूसरे से?” अभी मैं मन ही मन अपनी भूल का एहसास कर ही रहा था कि उन्होंने अपनी कुर्सी से एक फीट आगे झुकते हुए दोनों पंजों को सटाया और बोले-“जी करता है, आपके पांव छू लंू।”
ये सुनकर मेरी आंखे डबडबा गईं और उनके सम्मान में दोनों हथेलियां एक हो गईं।
तत्क्षण श्री अशोक कुमार सिन्हा (मेरे गांव से सटे चांदी गांव निवासी, साहित्यकार सह अपर निदेशक, पटना संग्रहालय) की बातें मन में कौंध गईं। उन्होंने बताया था-“एक बार सांस्कृतिक टीम के साथ माॅरिशस गया था। वहां के राष्ट्रपति ने डिनर पर सबको आमंत्रित कर सम्मानित किया। सम्मान समारोह के दरम्यान बारी-बारी से मंच पर बुलाया जा रहा था। टीम में शामिल ‘पद्म श्री‘ बउआ देवी का नाम जैसे ही लिया गया, राष्ट्रपति ने उन्हें अपने चेयर से उठते देख हाथ से बैठने का इशारा किया। वे गिफ्ट लेकर स्वयं बउआ देवी के पास चले गए और गिफ्ट देकर उनके पांव छू लिए।” खैर!
इसी दरम्यान एडीसी कमरे में प्रवेश किए। अभिप्राय था कि मुलाकात का समय समाप्त….। माननीय राज्यपाल ने बाया पंजा उठाकर सर को नीचे-ऊपर करते हुए इंतजार का इशारा किया। काॅलबेल दबाकर अपने ओएसडी को बुलाया। उनसे विजिटिंग कार्ड देने को कहा और बोले “भवेश जी को किसी दिन बुलाकर एक घंटा बात कीजिए, फिर बताईए, हम लोग क्या सहयोग कर सकते है। इसी बीच कमरे में प्रवेश करते राजभवन के छायाकार को देख मैंने अपनी पुस्तक ‘हाशिए पर हसरत‘ की प्रति भेंट करने के लिए अपनी कुर्सी से उठा। वे भी आसन से उठ गए। जब अपनी पुस्तक भेंट करने लगा तो उन्होंने सामने खड़े मेरे पुत्र को स्नेहपूर्ण आदेशित शब्दों में अपने पास बुलाया और उसकी बाजू पकड़कर पास खड़ा होने को कहा। जब दो कदम बढ़कर विदा करने लगे तो अनायास ही मेरे दोनो बाजू उनके पैरों की बढ़ गए। वे इसे ताड़कर मेरे दोनों हाथ पकड़ लिए। उन्होंने आश्वासन दिया कि मेरे द्वारा निर्माण कराए जा रहे छात्रावास में वे मदद करेंगे और मेरे आमंत्रण पर वे आएंगे भी। उन्होंने प्रोत्साहित करते हुए कहा-“आप बहुत बड़ा सामाजिक कार्य कर रहे हैं। आपके छोटे कार्यक्रम में भी वे आएंगे। मुझे भी अपनी संस्था का सदस्य बना लीजिए।” माननीय राज्यपाल ने अपने पैर छुने का अवसर नहीं देते हुए ससम्मान विदा किया, लेकिन मैंने मन ही मन उनके पांव छू लिए………
पद्मश्री भीम सिंह भवेश