धर्म से मैं हिंदू था तो क्या जीने का अधिकार नहीं कलमा जो मैं पढ़ लेता, होता दरिंदगी का शिकार नहीं…..!


धर्म से मैं हिंदू था तो क्या जीने का अधिकार नहीं
कलमा जो मैं पढ़ लेता, होता दरिंदगी का शिकार नहीं…..!
पहलगाम की वादियों में जीवन का आनंद लेने को
भाग्य ने रचा खेल , जीवनसंगिनी का मिला प्यार नहीं…….!
सात वचन हाय..!बस सात दिन कैसी विडंबना आई थी
क्रुरता की हर हद पार हुई, आगे जीवन स्वीकार नहीं…..!
दरिंदों ने धर्म पूछ गोली दागी सीने में
दिखा उस कली के गले का क्यूं हार नहीं……!
मेहंदी अब भी महक रही थी, पांव माहवार सजे
रो रो मांगती प्रिय का जीवन, पर उनको स्वीकार नहीं…!
मज़हब से जिहाद करने वाले मानवता शर्मशार कर गए
दिखते थे वे भी इंसान थे, मगर इंसानियत का नाम नहीं…..!
धर्म पूछ कर गोली दागी, मानवता से सरोकार नहीं
वस्त्रविहीन कर मज़हब देखा, दुष्टों में
संस्कार नहीं…!
ऐसे खूनी खेलों से सजता रोज अखबार अब
एक के बदले सौ को मारो, मिलता ऐसा अधिकार नहीं…..!
कोख सुनी,मांग सुनी, कितने जीवन उजड़ गए,
अब तो वे जहां छोड़ चले, अब जीवन में प्रकाश नहीं…!
ममता प्रिया
रक्तसेविका सह सामाजिक कार्यकर्ता सह लेखिका
जहानाबाद, बिहार