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बिहार :ज्ञान,त्याग और क्रांति की जमीन :सुभाष शर्मा



*बिहार की वो गौरवगाथा, जो सियासी स्वार्थों के साए में गुम हो गई*


जब भी बिहार का नाम लिया जाता है, तो अक्सर चर्चा राजनीति की उठापटक, पलायन या बेरोजगारी जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द ही सिमट जाती है। परंतु यह वही बिहार है, जिसकी मिट्टी में सिर्फ संघर्ष नहीं, संस्कार और संकल्प भी सांस लेते हैं। यह धरती केवल भूगोल नहीं है, यह आत्मा है—वो आत्मा जिसने दुनिया को विचार, विज्ञान, और विजेता तीनों दिए।

यह वही भूमि है जहाँ से सम्राट अशोक ने करुणा और न्याय का संदेश पूरी दुनिया को दिया। जहाँ आचार्य चाणक्य ने केवल तख्त पलटे नहीं, बल्कि राजनीति और राष्ट्रनीति की नींव रखी।

बिहार ने ही वो ज्ञान दिया जिससे ‘शून्य’ का आविष्कार हुआ, और वही शून्य दुनिया के लिए अनंत संभावनाओं का द्वार बन गया। नालंदा और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालयों ने उस युग में भी हजारों छात्रों को ज्ञान-दीप थमाया, जब दुनिया के अधिकतर हिस्से अज्ञान के अंधकार में थे।

यह वही बिहार है, जहाँ से दशरथ मांझी जैसे दृढ़ नायक पैदा होते हैं, जो अकेले पहाड़ काट कर रास्ता बना देते हैं—ये सिर्फ कहानी नहीं, संघर्ष से जन्मी सत्यगाथा है।


यह वही बिहार है जहाँ डॉ. श्रीकृष्ण सिंह जैसे दूरदर्शी नेतृत्वकर्ता जन्मे, जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद बिहार की नींव को शिक्षा, औद्योगीकरण और सामाजिक न्याय से मजबूत किया।
यह वही धरती है जहाँ लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने सम्पूर्ण क्रांति का बिगुल फूंका और लोकतंत्र को पुनः जागृत किया, जब देश तानाशाही के अंधेरे में डूबने लगा था।
और यही वह पावन भूमि है, जहाँ स्वतंत्रता संग्राम के अग्निपुत्र दादा श्री बाबू रामविलास सिंह ने गया समाहरणालय से यूनियन जैक को उतारकर स्वराज का तिरंगा फहराया, जिससे अंग्रेजी हुकूमत की नींव तक हिल उठी


वीरता और विचारधारा की समरसता का अद्भुत उदाहरण भी है यह भूमि।
एक हाथ में तलवार और दूसरे में कलम लिए, कुंवर सिंह और दिनकर जैसे महापुरुषों ने देश को आज़ादी की राह दिखाई। बिहार की पहचान सिर्फ इतिहास में नहीं, उसकी आत्मा में है।

बिहार ने लोकतंत्र को भी गहराई से समझा। जब बाकी दुनिया राजतंत्र में उलझी थी, तब यहाँ गणराज्य की अवधारणा फल-फूल रही थी। यही वजह है कि यहाँ की जनता ‘जय हो नहीं, जय जनता की हो’ में विश्वास करती है।

यहाँ की संस्कृति में सहिष्णुता है, शौर्य है, और सेवा की भावना है। उम्र चाहे बीस की हो या अस्सी की—यहाँ जब कोई पुकारता है, तो प्राण तक न्योछावर कर देने को तैयार रहते हैं।

यह वही बिहार है
जहाँ इतिहास किताबों में नहीं, लोगों की आँखों में झलकता है।
जहाँ कविता और क्रांति, दोनों एक ही साँस में जन्म लेते हैं।
जहाँ हर दिल गर्व से कहता है—
“हाँ, मैं बिहारी हूँ… और मुझे अपनी मिट्टी पर नाज़ है।”

लेखक: सुभाष शर्मा
(जहानाबाद, बिहार)

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