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अब आओ पिया अब आओ पिया


अब आओ पिया अब आओ पिया
फागुन में घर आओ पिया
रंग तो सब छूट जाए
मुझे प्रीत का रंग लगाओ पिया
आओ पिया फागुन में घर आओ पिया
आओ पिया आओ पिया
मिलन की आस जगाओ पिया
सखियां सारी छेड़े हैं
काजल भी मिट जाएं है
श्रृंगार कर इठलाऊं जितना
अब दर्पण भी ताना देवे है
आओ पिया फागुन में घर आओ पिया
अमीया भी अमराई अब तो
कोयल भी कुक मचाई है
नव यौवन सा श्रृंगार कर बगिया
भंवरों को ललचाई है
बरसाने की होली आज
कान्हा मुरली बजाए है
रंग घुले अबीर उड़े
भंगिया सबको झुमाएं है
कान्हा ने मारी पिचकारी
गोपियां भरे है सिसकारी
आओ पिया अब आओ पिया
फागुन में घर आओ पिया…
ममता प्रिया ✍️
रक्तसेविका सह सामाजिक कार्यकर्ता सह कवियत्री
जहानाबाद