बचपन की यादों का पिटारा
बचपन के वो दिन कहाँ गए ,
खिलौनों के संग खेले हुए पल ?
“अब ज़िंदगी उलझनों से भर गई हैं”
मिट्टी के घरोंदों में सपनो की बातें,
छोटी-छोटी खुशियों में दिल से मुस्कुराना ।
न चिंता थी कल की, न फिकर कोई भारी,
बस ख्वाबों की दुनिया थी अपनी सबसे प्यारी।
नादान दिल मासूम रातें,
सपनों में खोई वो प्यारी बातें।
कागज़ की नाव , बारिश के मौसम,
अब इन हाथों में कहाँ बचा वो बचपन।
न किताबों की चिंता, न सपनों का भार,
बिना वजह दौड़ना, बेपरवाह जीना।
“अब हर कदम पर सोच-समझकर चलना होता हैं”
अब सब कुछ है,लेकिन वो सुकून कहाँ?
हाय बचपन वाले वो दिन कहाँ , अब वो जुनून कहाँ?
छोटे छोटे खिलौनों के लिए दिन रात रोना,
आज इतने तकलीफ में भी सबके सामने मुस्कुराना।
पहले दोस्तों के साथ खुशियां बांटते थे,
अब चैट पर सिर्फ शब्दों का आदान-प्रदान होता हैं।
बचपन की यादें अब बस यादें रह गई,
जो आँखें बंद करूँ तो पास खड़ी मिलती हैं।
काश वो दिन लौट आएं फिर,
जहां न चिंता थी कल की न फिकर कोई भारी,
की ये दुनिया बहुत रुलाती है अब।
की ये दुनिया बहुत रुलाती है अब।
✍️चांदनी कुमारी
जहानाबाद, बिहार

