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शायर लतीफ शमशी की मृत्यु केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि एक युग का अंत है।




      *सैयद लतीफ शम्शी अंजुम काकवी, तहज़ीब व सकाफत और उर्दू अदब के नायाब नगीना थे*

काको (जहानाबाद)

काको, बिहार की वह सरज़मीं है जो अपनी तहज़ीब, अदब और सांस्कृतिक धरोहर के लिए सदियों से मशहूर रही है। इस मिट्टी ने न जाने कितनी अदबी और सांस्कृतिक हस्तियों को जन्म दिया है। उन्हीं में से एक चमकता सितारा थे सैयद लतीफ शम्शी अंजुम काकवी,जिन्हें प्यार से “अलमा चचा” कहा जाता था। उनका नाम केवल काको की पहचान नहीं, बल्कि पूरे उर्दू अदब और भारतीय संस्कृति का प्रतीक बन चुका है। सैयद अलमा लतीफ शम्शी साहब का जन्म वायसराय-आवास (वर्तमान राष्ट्रपति भवन) में हुआ था। उनके पिता जनाब ए. डी. शम्सी वायसराय के निजी सचिव थे और पहले भारतीय थे जो इस ऊँचे पद पर पहुँचे। शुरुआती तालीम उन्होंने अपने पुश्तैनी इलाक़े काको से हासिल की। इसके बाद, उन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में उच्च शिक्षा ग्रहण की।उनके लोकल गार्डियन कोई और नहीं बल्कि स्वतंत्र भारत के तीसरे राष्ट्रपति डॉ. ज़ाकिर हुसैन थे। डॉ. हुसैन की देखरेख में उन्होंने राजनीति विज्ञान में एम.ए. किया और अलीगढ़ विश्वविद्यालय में छात्र संघ के अध्यक्ष रहे। यह उनकी नेतृत्व क्षमता का पहला उदाहरण था। लतीफ शम्शी साहब भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और बाद के दौर में एक सक्रिय राजनीतिज्ञ के रूप में उभरे। वह डॉ. राम मनोहर लोहिया के शिष्य थे और सोशलिस्ट पार्टी में उनका विशेष योगदान रहा। उन्होंने अनेक प्रमुख राजनीतिज्ञों के साथ काम किया, जिनमें इंदिरा गांधी, जॉर्ज फर्नांडीस, हेमवती नंदन बहुगुणा, और कर्पूरी ठाकुर जैसे नाम शामिल हैं। सैयद लतीफ शम्शी ने काको की सांस्कृतिक और अदबी विरासत को एक नई पहचान दी। उनकी पुस्तकें, लेख, और शायरी उर्दू अदब के लिए एक धरोहर की तरह हैं। उनकी प्रसिद्ध कृति “काको की कहानी अलमा की ज़ुबानी” काको की इतिहास, संस्कृति और अदब का जीवंत दस्तावेज़ है। उनकी  दुसरी अहम किताब ” अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और मेरी दास्तान ए हयात” स्वतंत्रता आन्दोलन में उनके योगदान की याद दिलाती है। अलमा शमशी ने स्वतंत्रता आन्दोलन में अपने को झोंक दिया था लेकिन लेकिन वाह रे शमशी साहब स्वतंत्रता सेनानी पेंशन लेने से इसलिए इंकार कर दिया कि मैंने स्वतंत्रता आन्दोलन में इस लिए हिस्सा नहीं लिया था कि मैं इसका खेराज वसुल करुं। काको की तारीफ में उनका यह शेर उनकी भावनाओं को व्यक्त करता है…
“काको मुझ पर फिदा – मैं फिदा-ए-काको।
किस आसमान की ताक़त है कि हमसे छुडाए काको।”

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से उनकी भावनाओं को इस शेर से समझा जा सकता है कि….

अलीगढ़ की गलियां अभी तक जवां हैं।
जहां हंसते हंसते जवानी लुटा दी।।

सैयद लतीफ शम्शी केवल एक इंसान नहीं, बल्कि एक पूरी तहज़ीब थे। उनके किस्से, उनका ज्ञान, और उनकी सोच आज भी काको और उसके लोगों को प्रेरणा देती है। उनकी ईमानदारी और समाज के हर तबके को साथ लेकर चलने की सलाहियत उन्हें दूसरों से अलग बनाती थी। उनके बारे में यह कहना बिल्कुल सही है “अच्छे लोगों को ढूंढना मुश्किल होता है, छोड़ना और भी मुश्किल और भूल जाना नामुमकिन। 8 जनवरी 2025 को, सुबह 5 बजे, सैयद लतीफ शम्शी साहब ने अपने पुश्तैनी वतन काको में आखिरी सांस ली। लगभग 90 वर्षों का उनका जीवन समाज, अदब और संस्कृति को समर्पित था। उनकी मृत्यु केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि एक युग का अंत है। अल्लाह से दुआ है या अल्लाह, मरहूम सैयद लतीफ शम्शी साहब की मग़फ़िरत फरमा, उनके दर्जात बुलंद कर, और जन्नतुल फिरदौस में आला मुक़ाम अता फरमा। आमीन।”

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