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रमेश ‘कँवल’,बिहार प्रशासनिक सेवा के सेवा निवृत पदाधिकारी रविवरीय अंक के लिए संकलित

रमेश ‘कँवल’,पटना की ग़ज़ल
झील के पत्थरों की क़िस्मत हूं
आपके हुस्न की लताफ़त हूं
लग़्जिशे इश्क़ की इनायत हूं
आबे-दरिया पे इक लकीर नहीं
पत्थरों पर लिखी इबारत हूं
फ़ैसला करता हूँ गवाह बिना
दौरे-हाज़िर की मैं अदालत हूँ
मुझको अन्दर से तुम पुकारो तो
मैं हूँ बाहर तुम्हारी चाहत हूँ
मुझको धारे नदी के मिल न सके
झील के पत्थरों की क़िस्मत हूं
मुझको प्रेम और दया फ़िज़ूल लगे
दौरे-नौ की मैं इक तिजारत हूँ
चाँद को थाल में उतारूं ‘कँवल’
एक बच्चे की ज़िद हूँ ! जुरअत हूँ
