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रमेश ‘कँवल’,बिहार प्रशासनिक सेवा के सेवा निवृत पदाधिकारी रविवरीय अंक के लिए संकलित

कालजयी घनश्याम,नई दिल्ली की ग़ज़ल
याद रहे यौवन के दिन
फिक्र न कुछ बंधन के दिन।
ऐसे थे बचपन के दिन।
उलझे बालों की झटकन,
थे अपने बन-ठन के दिन।
मजनूँ, रांझा बने फिरे,
ऐसे थे बचपन के दिन।
आज अखाड़े यार कहाँ,
दूर हुए उबटन के दिन।
बेमकसद फिरते रहना,
याद रहे यौवन के दिन।
करवा चौथ रहा अपना,
और कहाँ साजन के दिन।
अब घनश्याम भजन कर लो,
शेष रहे सुमिरन के दिन।
✍ कालजयी घनश्याम
नई दिल्ली
