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रमेश ‘कँवल’,पटना की ग़ज़ल


रमेश ‘कँवल’,पटना की ग़ज़ल
कुछ लोगों को कमाने की आदत नहीं रही
रिश्तों में पहले जैसी तमाज़त1 नहीं रही
शक शुब्हा है सभी पे वो चाहत नहीं रही
सच है कि खुल के अपनी अदावत2 नहीं रही
पर साथ – साथ रहने में लज्ज़त नहीं रही
दिलकश है हुस्न उनका मैं अब भी जवान हूँ
पर वस्ल के मिज़ाज में उजलत3 नहीं रही
पहले जो बनते और संवरते थे रात दिन
‘टिक टाक’ से तो अब उन्हें फ़ुर्सत नहीं रही
जम्हूरियत है कैसी कि ‘चुप रह’ ये हुक्म है
ताले हैं लब पे इज्ने-समाअत4 नहीं रही
कुछ लोग तो कमाते हैं दिन रात बिन थके
कुछ लोगों को कमाने की आदत नहीं रही
पहले जो सुबहो-शाम ‘कँवल’ मेहरबान थे
उन दोस्तों की हम पे इनायत5 नहीं रही
1 गर्मी 2दुश्मनी 3 उतावलापन 4 सुनने की अनुमति 5 कृपा