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रमेश कॅंवल ,पटना की ग़ज़ल

रमेश कॅंवल ,पटना की ग़ज़ल

जाने कब होगा आगमन उसका


चूम कर आ गया नयन उसका
कांपता रह गया बदन उसका

स्वच्छ उजला तो है वसन उसका
साफ़ कब हो सकेगा मन उसका

अब प्रदूषण से देश हो रक्षित
शोर से मुक्त हो गगन उसका

वस्ले-रब तो है अस्ल में जीवन
हिज़्रे- तहज़ीब है कफ़न उसका

शोर की वहशतों की दहशत है
कब सुकूं पाएगा वतन उसका

हम भी पलकें बिछाए बैठे हैं
जाने कब होगा आगमन उसका

किस सलीक़े से पढ़ रहा है ग़ज़ल
किस बुलंदी पे है सुख़न उसका

बंदिशों का है दख़्ल हसरत पर
है ख़फ़ा कब से गुलबदन उसका

कह रहा है ‘कॅंवल से शोख बदन
आज भर दीजिए न मन उसका

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