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ग़ज़ल – रमेश ‘कँवल’


ग़ज़ल – रमेश ‘कँवल’
ग़म दबे पांव घर में आने लगे
आप मेरे क़रीब आने लगे
फूल गुलशन के खिलखिलाने लगे
लब पे ज़ुंबिश हया निगाहों में
आप बाँहों में आ के जाने लगे
रूठना उनको भा गया बेहद
बात बेबात हम मनाने लगे
बात ख़ुशियों से कर रहा था मैं
ग़म दबे पांव घर में आने लगे
आप आए तो सुख के सौ मौसम
मेरे जीवन में गुनगुनाने लगे
देख कर उनको ख़ुश हुआ बेहद
देखने में उन्हें ज़माने लगे
आपको पाया तो लगा ऐसा
हाथ में हुस्न के ख़ज़ाने लगे
धड़कनों में ‘कॅंवल’ बसे हैं जो
दूसरा शह्र अब बसाने लगे