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तू दीपक बन


तू दीपक बन
छल, कपट, प्रपंच भूला
अपने अंदर खुद्दारी रख
तू ज्वाला नहीं, दीपक बन
तू सबके लिए वफादारी रख।
कैसा भी हो जीवन का रंग
खाली दीया या तेल चढ़ा सा
पर तुम मुस्कुराओ सदा
महफ़िल में जगमगाओ सदा।
जीवन को चट्टान बना मत
जो रुका रहे और रोक दे राह,
पर तुम ऐसा मत करना,
तू सदा दीपक बनना।
ना सिर्फ तुम त्योहार मनाओ,
बल्कि मानवता धर्म निभाओ
दीपक रूपी इस जीवन में
तेल रूपी कर्तव्य निभाओ।
ना आधी बन ना ज्वाला
तू दीपक सा फैला उजाला,
दीपक सा सहयोग देकर
जग से तिमिर को दूर कर
जिससे औरों को भी साथ मिले
सुंदर, साफ़ मुकाम मिले
तेरा परोपकार रूपी जीवन से
सबको सुंदर, सुनहरा राह मिले।
कुमारी मानसी (अनुसंधायिका)
स्नातकोत्तर हिंदी विभाग
मगध विश्वविद्यालय, बोध गया (बिहार)