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ग़ज़ल – रमेश ‘कँवल’


ग़ज़ल – रमेश ‘कँवल’
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
2122 2122 212
फूल ख़ुशबू से समाहित हो गए
देवचरणों मे सुशोभित हो गए
पेड़ पौधे जब सुरक्षित हो गए
लोग फिर कितने व्यवस्थित हो गए
शह्र का ज़हरीला है वातावरण
नागरिक ख़ुशियों से वंचित हो गए
नाम पर इक शख्स के गतिरोध है
इस लिए सब कार्य बाधित हो गए
मुंबई की जैसे लोकल ट्रेन हो
आप मेरे दिल में पूजित हो गए
है ये अमृतकाल कैसे दिन फिरे
मुल्क के रहबर विलोपित हो गए
रख सका अंकुश न जो लब पर ‘कँवल’
उसके पल क्षण में तिरोहित हो गए
28 मार्च, 2023