डा एकता कि कलम से—


*डा एकता कि कलम से—-*
*लबों पर हंसी दिल में उठाता हर पल एक तूफान है।*
*जिंदगी से लाखों शिकायत सवाल है।*
*जो अपना था ,कभी अपना ना हुआ।*
*और जिसे शिद्दत से अपना बनाना चाहा वह पराया था।*
*सुना था शिद्दत से चाहो तो भगवान मिल जाते हैं।*
*पर यहां कलयुग है जनाब यहां* *शिद्दत से नहीं मतलब से लोग मिलते हैं,और बिछड़ते है।*
*और हम यह भ्रम पाल लेते हैं ।कि वह हमें पसंद करते हैं।*
*यहां प्रेम एक छल एक दिखावा है।*
*वह यह दिखावा बार-बार करते हैं।*
*और इस झूठ पर हम एतबार बार-बार कर लेते हैं।*
*बड़े पीड़ा से गुजरी है ,जिंदगी हमारी*
*जहां हमारे खयालात मासूमियत चंचलता ने दम तोड़ते गए,*
*मोम सा हमारा दिल पत्थर सा हो गया।*
*दिल में लाखों दर्द दबाए बैठे हैं, और चेहरे पर झूठी खुशी दिखाएं फिरते हैं।*
*यहां सच्चाई का मुंह काला है और झूठ का बोलबाला है।*
*हमने इस जीवन से तो एक बात सीख ली है, हक जताने से कोई अपना नहीं होता*
*कोई समान हो या इंसान, जिंदगी की हर ठोकर हर धोखे ने हमें यह सिखाया है।*
*की चाहे कितनी भी कठिनाई हो कोई भी रास्ता हो भरोसा हमेशा अपने पैरों पर रखना।*
*दूसरे से की उम्मीदें दगा दे जाती है, भरोसा टूट जाता है*
*और इंसान बिखर जाता है ,जो अपना था कभी अपना ना हुआ।