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औपचारिक रिश्ते


औपचारिक रिश्ते
जिस रिश्ते में कद्र ना
उन रिश्ते को निभाना
गद्दारों से दोस्ती
और झूठे रिश्ते में रहकर
औपचारिकता निभाना
जी मुझे नहीं आता
ऐसे रिश्ते को चलाना
जहां नहीं कोई प्रेम हो
ना अंतर्मन का स्नेह हो
छल कपट प्रपंच भरा हो
आपसी राज द्वेष हो
बस अपनेपन का नाम हो
गैरों से बदतर काम हो
सामने हो तो गले लगाए
पीठ पीछे खंजर चलाए
अगर अच्छे हैं तो साथ रहो
मुझमें कमियां हैं बात करो
गैरों पर न विश्वास करो
फिर भी कुछ हो फरियाद करो
मैं गलत और तू सही
गर लगता है कोई बात नहीं
छोड़ना है तो छोड़ो
गर रहना है तो साथ रहो
मुंह में राम बगल में छुरी
रखने वाले हम नहीं
और जैसे हैं वैसे रहेंगे
कोई बदल दे किसी में दम नहीं
पर झूठे रिश्ते में रहकर
औपचारिकता निभाना
जी मुझे नहीं आता
ऐसे रिश्ते चलाना……!!🙏🙏
कुमारी मानसी (अनुसंधायिका)
स्नातकोत्तर हिंदी विभाग
मगध विश्वविद्यालय, बोध गया (बिहार)।